इन खबरों पर भारत को निश्चित रूप से सतर्क रहने की जरूरत है कि अमेरिका ने तालिबान से बातचीत शुरू कर दी है। ‘आपसी भरोसा पैदा करने की’ ये बातचीत कतर में हुई है, जहां तालिबान को औपचारिक रूप से अपना राजनीतिक कार्यालय खोलने की इजाजत दी गई। चूंकि पाकिस्तान तालिबान नेताओं के वहां पहुंचने में मददगार बना, इसलिए इस अनुमान का ठोस आधार है कि उसे विश्वास में लिया गया है। जबकि अफगानिस्तान की हामिद करजई सरकार को इसमें कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं दी गई है। हालांकि आरंभ में उसने इस पर नाराजगी जताई, लेकिन अब इस हकीकत को संभवत: मान लिया है कि अमेरिका अफगानिस्तान की भावी व्यवस्था तय करने के क्रम में तालिबान को एक पक्ष मानता है। भारत से इस संबंध में कोई मशविरा किया गया है, इसके कोई संकेत नहीं हैं।
चूंकि अतीत में भी अमेरिका अफगानिस्तान संबंधी वार्ताओं में भारत की उपेक्षा कर चुका है, इसलिए यह आशंका गहरी है कि भारत के रणनीतिक एवं सामरिक हितों का ख्याल किए बिना वह 2014 के बाद के अफगानिस्तान की कोई व्यवस्था तय कर दे, जब उसकी फौज वहां से लौट जाएगी। तालिबान अब कट्टरपंथी विचारों और आतंकवादी तौर-तरीकों में भरोसा नहीं करता, यह मानने का कोई कारण नहीं है। इसके अलावा अफगानिस्तान में वह पाकिस्तान के एक हाथ के रूप में काम करता है, यह भी अनुभवों से सिद्ध है। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं से उसे वैधता और अफगानिस्तान की भावी व्यवस्था में उसे भूमिका मिलना चिंताजनक है। इसका परिणाम उन तमाम कामयाबियों पर पानी फिरने के रूप में सामने आ सकता है, जो पिछले एक दशक में अफगानिस्तान में बुनियादी ढांचे के विकास में अपने बहुमूल्य योगदान और करजई सरकार के साथ रणनीतिक संबंध विकसित करते हुए भारत ने हासिल की। दरअसल, कतर वार्ता प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल हैं। क्या जिस ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ से दुनिया के अनेक हिस्से अस्थिर हुए, उसे बिना अंजाम तक पहुंचाए अब अमेरिका खुद ही उसे छोड़ रहा है? इससे भारत को क्या सबक लेना चाहिए, यह विचारणीय है।