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अब घर में भी ढेर

Bhaskar News | Dec 19, 2012, 01:07AM IST
 
 

भारतीय क्रिकेट के रुतबे पर यह सचमुच बहुत बड़ी चोट है। उपमहाद्वीप के बाहर की पिचों पर भारतीय टीमों की कमजोरी का इतिहास पुराना है, लेकिन अपने घर में उसकी शेर की छवि काफी मजबूत रही है।
 
ताकतवर से ताकतवर विदेशी टीम के लिए भी भारत आकर टेस्ट सीरीज जीतना कभी आसान नहीं रहा। इसीलिए विश्व क्रिकेट पर अपने वर्चस्व की पुष्टि करने की इच्छुक टीमों ने हमेशा भारत को फाइनल फ्रंटियर यानी आखिरी मोर्चा माना। रिकी पोंटिंग की ऑस्ट्रेलियाई टीम ने 2004-05 में इस मोर्चे को जीता, तो उससे भारत की छवि आहत हुई, लेकिन उस टीम की क्वालिटी और उसमें चैंपियन खिलाड़ियों की भरमार को देखते हुए उसे एक स्वाभाविक संदर्भ में देखा गया।
 
मगर अब इंग्लैंड ने जिस तरह 28 साल बाद यहां आकर सीरीज फतह कर ली है, उसे उस क्रम में नहीं रखा जा सकता। बल्कि चार टेस्ट मैचों की इस श्रंखला का नतीजा तय करने में भारतीय टीम की अपनी कमजोरियां ज्यादा जिम्मेदार रहीं। राहुल द्रविड़ ने गौरतलब बात कही है कि मुद्दा सिर्फ खिलाड़ियों के नजरिये का नहीं है, बल्कि सवाल यह भी है कि क्या भारत में टेस्ट क्रिकेट लायक क्षमता एवं कौशल के खिलाड़ी सामने आ रहे हैं? पिछले दो दशकों में भारत सौभाग्यशाली रहा कि यहां प्रतिभा एवं दृढ़ संकल्पशक्ति से संपन्न खिलाड़ी उभरे, जो भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाइयों तक ले गए। लेकिन उन खिलाड़ियों के अपने प्रमुख दौर से गुजर जाने और उनकी जगह लेने लायक नए खिलाड़ियों के सामने न आने से अब स्थिति चिंताजनक है।
 
निस्संदेह इससे भारतीय क्रिकेट की व्यवस्थागत खामियां उजागर होती हैं, जिसमें तैयारी एवं योजना का घोर अभाव है। इसलिए हार के बाद सिर्फ कप्तान महेंद्र सिंह धोनी या टीम के कुछ अन्य खिलाड़ियों पर ठीकरा फोड़ने से कोई रास्ता नहीं निकलेगा। धोनी ने मनमुताबिक पिच बनवाने के मुद्दे पर विवाद खड़ा कर जरूर अपनी छवि खराब की। लेकिन अगर टीम में जीतने का माद्दा नहीं है, तो फिर ऐसे टोटकों के अलावा क्या रास्ता रह जाता है? बहरहाल इंग्लिश टीम की जीत ने साबित कर दिया है कि जीत अंतत: क्वालिटी की होती है। क्या भारत में इससे कोई सबक लेने वाला है?
 

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