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लकीर की फकीर ओलिंपिक कमेटी

Bhaskar News | Dec 07, 2012, 00:10AM IST
कहा  जा सकता है कि अगर भारतीय ओलिंपिक संघ (आईओए) ने सरकार की तरफ से पेश चुनाव संहिता को अपने संविधान में समय पर शामिल कर लिया होता, तो उसके अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति (आईओसी) से निलंबन की नौबत नहीं आती।
 
भारत सरकार और आईओए पर ये तोहमत भी लगाई जा सकती है कि उन्होंने आईओसी के सामने अपना पक्ष स्पष्टता एवं दृढ़ता से नहीं रखा। इसके बावजूद आईओसी ने जो फैसला किया, उससे उसका अहंकारी नजरिया ही सामने आया है। खेलकूद में राजनीतिक हस्तक्षेप न हो, यह उचित आकांक्षा है। खेल संघों के कामकाज में सरकारी हस्तक्षेप कई बार दुर्भावनापूर्ण एवं संघों को मनमाने ढंग से चलाने की कोशिश का हिस्सा होता है।
 
इसलिए सरकारों के दखल को रोकना एवं खेल संघों की स्वायत्तता की रक्षा एक भला उद्देश्य है। लेकिन भारत का मौजूदा संदर्भ अलग है। यहां खेल संघों के बारे में जो संहिता तैयार हुई, उसके पीछे मकसद खेल भावना की रक्षा है। इसे न समझना आईओसी के लकीर का फकीर होने की झलक देता है। भारतीय खेल संघों पर ऐसे लोग कुंडली मारकर दशकों से बैठे हैं, जो खेल के विकास में बाधक हैं।
 
ये संघ जवाबदेह बनें और उनके पदाधिकारियों के लिए नियम-कायदे तय हों, यह आज खेल के विकास और खिलाड़ियों के हित की रक्षा की अनिवार्य शर्त है। इसी मकसद से सरकार ने संहिता तैयार की। दिल्ली हाई कोर्ट ने इसके पक्ष में अपना निर्णय दिया। इसके बाद आईओए के पास इस संहिता के मुताबिक अपना चुनाव कराने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था।
 
इस संदर्भ में समझने की बजाय आईओसी ने अनुचित ढंग से इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया। किसी कदम को परखने के लिए यह कसौटी महत्वपूर्ण होती है कि जो हो रहा है, वह अच्छे के लिए है या नहीं? आईओसी ने इस मामले में दृष्टिहीनता का परिचय दिया है। बहरहाल, अब आईओए को जल्द से जल्द अपने संविधान में उपरोक्त संहिता शामिल कर इस संबंध में तमाम भ्रमों को खत्म कर देना चाहिए। यह अच्छी बात है कि एशियाड में अभी दो साल बाकी हैं। इसलिए भारत के फौरन किसी बड़े आयोजन से बाहर रह जाने का खतरा नहीं है।
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