सीरिया का मामला उलझता ही जा रहा है। यह लीबिया जैसा सीधा-सरल नहीं है, जिसके बारे में सुरक्षा परिषद ने सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित कर दिया था। उस प्रस्ताव की आड़ लेकर पश्चिमी राष्ट्रों ने कर्नल मुअम्मर गद्दाफी और उनकी सरकार दोनों को मार गिराया था। उस प्रस्ताव में सिर्फ नागरिकों के मानव अधिकार की रक्षा और निहत्थे लोगों को हवाई-कवच देने की बात कही गई थी। लेकिन पश्चिमी राष्ट्रों ने दम तोड़ते बागियों को हथियार, प्रशिक्षण, मार्गदर्शन सब कुछ दिया और वह कर दिखाया, जो वे लीबिया में करना चाहते थे। लगभग यही वे सीरिया में भी करना चाहते हैं, लेकिन इस बार रूस और चीन ने अंगद का पांव अड़ा दिया। उन्होंने वीटो कर दिया। जिस प्रस्ताव को रूस और चीन ने वीटो किया है, उसमें मांग की गई थी कि सीरिया में लोकतांत्रिक और विविधतामय राजनीतिक व्यवस्था निश्चित समयावधि में कायम की जाए और गृहयुद्ध को समाप्त किया जाए। रूस और चीन का कहना था कि इस नरम प्रस्ताव के पीछे भी तख्ता-उलट का लक्ष्य ही था। सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल अस्साद को खत्म करके उसकी जगह अपने किसी चमचे को सत्ता में बिठाने की जिद के कारण ही पश्चिमी शक्तियों ने यह अनैतिक प्रस्ताव पारित करने की कोशिश की थी। इस बार रूस और चीन ने तो इस प्रस्ताव का विरोध किया, लेकिन उनके साथी भारत ने उसका समर्थन कर दिया।
इधर यह प्रस्ताव रखा गया और उधर अस्साद की फौज और पुलिस ने ढाई सौ प्रदर्शनकारियों की हत्या कर दी। अब तक छह हजार से भी ज्यादा लोग सीरिया में मारे गए हैं। इतने लोग तो ट्यूनीशिया, मिस्र और यमन में भी कुल मिलाकर नहीं मारे गए। पिछले साल भर से चल रहे इस आंदोलन को दबाने में अस्साद और उनके परिवार ने पूरा जोर लगा दिया है। सीरिया के बहुसंख्यक लोग सुन्नी हैं, जबकि अस्साद शिया और अलवी हैं। उन्हें ईरान का पूर्ण समर्थन है। सीरिया की फौज और नौकरशाही पर अलवी संप्रदाय के लोगों का कब्जा है। जैसा कि सद्दाम हुसैन के इराक में सुन्नी अल्पसंख्यकों और तकरीती माफिया का कब्जा था। अस्साद का आरोप है कि उनकी सरकार को गिराने के लिए अमेरिका और अन्य पश्चिमी राष्ट्र हथियार, पैसा और प्रेरणा देने में कोई कोताही नहीं कर रहे हैं।
सीरिया के विरुद्ध सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव लाने वाले अरब लीग के राष्ट्रों को आशा थी कि जैसे उन्होंने यमन के राष्ट्रपति अब्दुल्ला सालेह को इलाज के बहाने बाहर भिजवाकर सत्ता-परिवर्तन करवा दिया, वैसा ही वे सीरिया में भी करवा देंगे, लेकिन सीरिया का सत्तारूढ़ अलवी भद्रलोक बड़ा ढीठ है। सुरक्षा परिषद में इस प्रस्ताव के गिरने से उसका दुस्साहस और ज्यादा बढ़ गया है। वह अपने निहत्थे नागरिकों पर गोलियां और बम रोज बरसा रहा है। सुरक्षा परिषद की बहस और मतदान से सीरियाई लोगों को राहत मिलना तो दूर, अब यह गृहयुद्ध और लंबा खिंच गया है।
सीरिया के मामले में भारत की भूमिका काफी ठीक-ठाक रही है। कुछ माह तक भारत का रवैया वही रहा, जो लीबिया के बारे में था। यानी सतर्क तटस्थता का। न तो वह बागियों के साथ था और न ही अस्साद सरकार के साथ। लेकिन अरब लीग द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव को समर्थन देकर भारत ने व्यावहारिक कूटनीति का ही परिचय दिया है। भारत के प्रयत्नों के कारण ही यह प्रस्ताव थोड़ा नरम किया गया। इसमें अस्साद को हटाने की बात स्पष्ट रूप से कहीं नहीं कही गई।
मूल प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि अस्साद अपने उपराष्ट्रपति को अपने अधिकार समर्पित कर दें, लेकिन यह प्रावधान भी निकाल दिया गया। संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र की धारा 42 के तहत सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप की बात भी नहीं कही गई। यह प्रस्ताव भी रखा गया कि अरब लीग की देख-रेख में मध्यस्थता शुरू की जाए, ताकि सीरिया की सरकार और बागियों के बीच एक सार्थक संवाद शुरू हो सके। भारत हमेशा राष्ट्रों के आंतरिक मामलों में सैन्य हस्तक्षेप के विरुद्ध रहा है। यदि संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं सैन्य हस्तक्षेप करने लगीं तो दुनिया की बहुत-सी सरकारें गिराई जाने लगेंगी, लेकिन भारत ने लीबिया संबंधी प्रस्ताव का विरोध करके यह पाया कि वह गद्दाफी के खेमे के साथ खड़ा दिखने लगा। सारे अरब जगत की जागृत जनता को भी आश्चर्य हुआ कि भारत जैसा तीसरी दुनिया का सबसे बड़ा नेता और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र लीबिया के तानाशाह के प्रति नरम क्यों दिखाई पड़ रहा था। इस बार भारत ने रूस और चीन का साथ नहीं दिया। उसके इस कदम की सराहना सारे अरब जगत में हो रही है।
सीरिया के विरुद्ध लाया गया यह प्रस्ताव वीटो जरूर हो गया, लेकिन भारत ने उसका समर्थन करके वास्तव में अमेरिका का साथ नहीं दिया, बल्कि खुद का ही साथ दिया है। भारत के वोट को महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा का हिस्सा मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। उसे इस रूप में देखा जाना चाहिए कि इस वोट के कारण अरब राष्ट्रों की सहानुभूति भारत ने स्वत: बटोर ली है। खाड़ी सहयोग परिषद के छह राष्ट्रों - सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, बहरीन, ओमान और कतर में भारत के लगभग 50 लाख नागरिक निवासरत और कार्यरत हैं। इन राष्ट्रों के साथ भारत का व्यापार और तेल-आयात भी बड़े पैमाने पर होता है। इनके अलावा उस प्रस्ताव का तुर्की, लीबिया, जॉर्डन और मोरक्को जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रों ने भी समर्थन किया था। ऐसे में भारत हवा के विरुद्ध क्यों तैरे? रूस और चीन का सीरिया की वर्तमान सरकार के साथ गहरा निहित स्वार्थ अटका हुआ है। सीरिया में रूस का सैनिक अड्डा है और वह उसे हथियार बेचकर मोटा पैसा भी कमाता है।
रूस और चीन की समस्या यह भी है कि वे अरब जगत में अमेरिका के साथ अपनी प्रतिस्पर्धा भी अनुभव करते हैं। ईरान के साथ इन दोनों देशों के विशेष संबंध हैं, जबकि अमेरिका ईरान विरोधी है। ईरान और अस्साद गहरे मित्र हैं। इसीलिए आज संयुक्त राष्ट्र संघ में ईरान, अस्साद, रूस और चीन एक ही कतार में खड़े दिखाई पड़ रहे हैं। अनेक अरब राष्ट्रों ने रूस और चीन की खुली निंदा शुरू कर दी है। भारत की किसी से भी कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। वह चाहे तो सीरिया के मामले में मध्यस्थ की जबर्दस्त भूमिका भी निभा सकता है।
वेदप्रताप वैदिक
लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।