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भीतरी शांति का स्पर्श पाते ही बाहरी उपद्रव ठंडे हो जाते हैं

पं. विजयशंकर मेहता | Mar 28, 2012, 00:05AM IST
 
 

जीने की राह.. संसार की वस्तुएं मिलने पर अगर हम यह मान लें कि सुख आ जाएगा तो जरूरी नहीं कि ऐसा होगा। अप्राप्त का रेगिस्तान यदि हमें परेशान करता है तो प्राप्त का दलदल भी हमें चैन से नहीं रहने देगा। चीजें मिल जाने पर जिंदगी की जमीन ठोस हो जाए, यह जरूरी नहीं होता।


कई बार सारे सुख और भोग आसपास हों, तब भी लगता है जैसे जिंदगी की जमीन दलदल की तरह है। एक पैर फंसा हुआ है, उसी में से दूसरे को उठाने की कोशिश की जाती है। पूरी चाल लड़खड़ाने लगती है, वस्त्र अलग गंदे हो जाते हैं, परिश्रम ज्यादा लगता है और ऐसा लगता है कि हमने नहीं, जिंदगी ने हमको लूट लिया है।


अपने बोझ के कारण दलदल में से निकलने की हिम्मत नहीं हो पाती। इसलिए संसार से जब भी कुछ प्राप्त करें, इस बात की सावधानी रखी जाए कि वह वजन न बन जाए। उपलब्धि दोष न हो जाए। असल में जब बाहर से हमें मिलने लगता है तो हम बाहर की ओर भागने लगते हैं। जैसे ही हम थोड़ी हिम्मत करके अपने भीतर झांकेंगे, तो पाएंगे कि वहां एक प्रकाश है, दौलत का एक भंडार है, बेशक सुरंग-सा रास्ता है, लेकिन खजाने पर जाकर खुलता है।


हमें समझ में आने लगता है कि बाहर जो रोशनी थी, उससे बड़ा कोई अंधेरा नहीं है और भीतर आरंभ में जो अंधकार लग रहा था, उससे भव्य कोई प्रकाश नहीं। जो लोग भीतर से रोशन हो जाते हैं, वे सक्षम मनुष्य बन जाते हैं। जब भीतर की गहन शांति हमें स्पर्श कर लेती है तो बाहर के उपद्रव खुद-ब-खुद ठंडे हो जाते हैं। अमृत और जहर का अंतर पता लगने लगता है। नवरात्र भीतर उतरने की नौ सीढ़ियां हैं, चूक न जाएं।
 
 
 

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