पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने काबिल-ए-तारीफ साहस दिखाया है। हालांकि पाकिस्तानी संदर्भ में यह बयान जोखिम भरा है, फिर भी उन्होंने बेलाग कहा कि कश्मीर मसले को युद्ध से हल नहीं किया जा सकता।
गौरतलब यह है कि गिलानी ने यह बयान पांच फरवरी को दिया, जिस दिन को पाकिस्तान हर साल ‘कश्मीर दिवस’ के रूप में मनाता है। यह दिन वहां समझदारी की बातों के लिए नहीं, बल्कि भारत विरोधी भावनाएं भड़काने के लिए जाना जाता है। दूसरी उल्लेखनीय बात यह कि गिलानी इस समय सेना एवं अति सक्रिय न्यायपालिका से सीधे संघर्ष में उलझे हुए हैं। इस परिप्रेक्ष्य में सामान्य रुझान यही होता कि वे उग्र राष्ट्रवादी भावनाएं भड़काने और भारत को नीचा दिखाने की राह पर चलते। इसके विपरीत उन्होंने अपने देश की तुलना में भारतीय लोकतंत्र की प्रशंसा की।
क्या इस बयान को पाकिस्तान में विभिन्न स्तरों पर बदलती फिजा का संकेत माना जा सकता है? गिलानी इस वक्त सर्वशक्तिशाली सेना और महत्वाकांक्षी न्यायपालिका के हमलों के बीच संसदीय जनतंत्र के रक्षक के रूप में खुद को पेश करने की कोशिश में जुटे हैं। इस राजनीतिक संघर्ष में समर्थन के लिए उनकी नजर स्वाभाविक रूप से उन जन समूहों पर होगी, जो शांति एवं लोकतंत्र में पाकिस्तान का हित देखते हैं। क्या ये तबके इतने मजबूत हैं, जिनके आधार पर कट्टरपंथ और रूढ़िवाद की ताकतों को चुनौती दी जा सकती है? इस प्रश्न का उत्तर जानने में भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया, बल्कि विश्व की दिलचस्पी है।
गिलानी सरकार का क्या हश्र होता है और अगले साल होने वाले चुनाव में पाकिस्तान किस राजनीतिक दिशा का चयन करता है, उससे इस बारे में साफ संकेत मिलेंगे। बहरहाल, इस घटनाक्रम में उन भारतीय समूहों के लिए भी कुछ सबक हैं, जो पाकिस्तान की सिर्फ एक छवि देखना पसंद करते हैं। अगर पाकिस्तान में एक नई सोच उभर रही है, जिसके केंद्र में शांति और जनतंत्र की चाह है, तो हमें उसकी अहमियत भी जरूर समझनी चाहिए। ऐसी सोच की जड़ें दोनों देशों में गहरी हों, इस इलाके के बेहतर भविष्य के लिए यह अतिआवश्यक है।