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खुदी को कर बुलंद इतना
खुशवंत सिंह
| Jul 07, 2012, 01:35AM IST

हम अक्सर किसी भी घटना के लिए दैवीय-अज्ञात शक्तियों या भाग्य को दोषी ठहराने लगते हैं। मुहम्मद इकबाल की एक लंबी गजल ‘शिकवा और जवाब-ए-शिकवा’ की विषयवस्तु भी कुछ इसी पर केंद्रित थी। मैंने इकबाल की उस गजल का अनुवाद किया था। मूल गजल और मेरा तजरुमा कुछ इस तरह है :
क्यूं जियां-कर बनूं,
सूद फरामोश रहूं?
फिक्र-ए-फर्दा न करूं,
मह्वे-गमे-दोश रहूं?
नाले बुलबुल के सुनूं
और हमहतन गोश रहूं?
हमनवा! मैं भी कोई गुल हूं
के खामोश रहूं?
जुर्रत आमोज मेरी
ताबे-सुखन है मुझको
शिकवा अल्लाह से
‘खाकुम बदहन’ है मुझको।
इस खूबसूरत गजल का तजरुमा कुछ यूं होगा :
आखिर क्यों मैं हमेशा झेलता रहूं शिकस्त, क्यों त्यागता रहूं वह लाभ, जिस पर आखिर मेरा ही हक है? मैं बीती हुई शामों के झुटपुटे में डूब गया हूं और आने वाली सुबह के लिए मेरे पास कोई योजनाएं नहीं हैं। आखिर क्यों मैं बुलबुल के विलाप को गौर से सुनता रहूं? दोस्तो, क्या मैं किसी फूल की तरह मूक हूं? क्या मुझे हमेशा चुप्पी साधे रहनी चाहिए? मेरी कल्पनाएं मुझे दुस्साहसी बनाती हैं और मेरी जुबान को लफ्जों से भर देती हैं। लेकिन यदि मैं ईश्वर से शिकायत करूं तो मेरे मुंह में खाक भर जाए।
इस गजल में इकबाल अपनी भावनाओं को बखूबी व्यक्त करते हैं। बहरहाल, एक अन्य स्थान पर इकबाल ने ही इससे तनिक विपरीत ये पंक्तियां भी लिखी थीं :
खुदी को कर बुलंद इतना
के हर तकदीर से पहले
खुदा बंदे से खुद पूछे
बता तेरी रजा क्या है?
यानी अपनी संकल्प शक्ति को इतना मजबूत बनाओ कि नियति के हर मोड़ पर खुद ईश्वर तुम्हारे जैसे नश्वर प्राणी से यह पूछे कि बताओ तुम्हारा इरादा क्या है? तुम्हें क्या चाहिए?
यकीन महकम, अमल पैहम
मोहब्बत फतह-ए-आलम
जिहादे-जिंदगी में
ये मर्दो की शमशीरें।
यानी जीवन के संग्राम में पुरुषों के पास केवल तीन हथियार होते हैं : यह भरोसा कि वह जो कर रहे हैं, ठीक कर रहे हैं, यह संकल्प कि वह अनंतकाल तक संघर्ष करते रहेंगे और वह करुणा, जो पूरी दुनिया को अपनी बांहों में भर ले।
अमल से जिंदगी बनती है
जन्नत भी, जहन्नुम भी
ये खाकी अपनी फितरत में
ना नूरी है ना नारी है।
यानी जीवन की राह इसी तरह तय होती है : हम उसे स्वर्ग बना सकते हैं, लेकिन हम उसे नर्क भी बना सकते हैं। हम जिस मिट्टी से बने हैं, उसमें न रोशनी का बसेरा है, न अंधेरे का।
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खर्च का खाता :
एक सेल्स मैनेजर अपने सेल्समैन के खर्च के ब्यौरों की पड़ताल कर रहा था। उसमें एक चीज ने सेल्स मैनेजर का ध्यान खींचा।
उसने सेल्समैन से कहा : ‘यह क्या है? आखिर कोई व्यक्ति झुमरी तलैया जैसे छोटे-से कस्बे में फूड लंच पर ही 1500 रुपए कैसे खर्च कर सकता है?’
सेल्समैन ने जवाब दिया : ‘बहुत सरल है। इसके लिए बस इतना ही करना है कि सुबह का नाश्ता करना बंद कर दें।’
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वैवाहिक विवाद :
पति ने ड्रेसिंग रूम के बाहर खड़े होकर चिल्लाते हुए कहा : मैं आखिरी बार पूछ रहा हूं, तुम चलने के लिए तैयार हो या नहीं?
पत्नी ने भीतर से जवाब दिया : बस, बहुत हुआ। मैं भी तो तुम्हें एक घंटे से बोल रही हूं कि बस एक मिनट में आ रही हूं।
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खोया-पाया :
संता ने बंता से कहा : मैंने सुना है कि तुमने उस व्यक्ति को बड़ा ईनाम देने की घोषणा की है, जो तुम्हें तुम्हारा गुमा हुआ बटुआ लाकर देगा।
बंता ने कहा : हां, सही सुना है। क्या तुम्हें मेरा बटुआ मिल गया?
संता ने कहा : नहीं, मैं तुम्हारे बटुए की खोजबीन शुरू करने ही वाला हूं, लेकिन मैं सोच रहा था कि क्या मुझे थोड़ा-सा पैसा एडवांस मिल सकता है?
(सौजन्य : रीतेन गांगुली, तेजपुर)
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पंजाबी डींग :
एक पंजाबी ने दूसरे से कहा : पंजाब में मेरे पिता के पास इतनी जमीन है कि वे अपनी जमीन का मुआयना कार में बैठकर करते हैं, लेकिन आज तक वे आधी जमीन भी पूरी नहीं देख पाए!
(सौजन्य : जेपी सिंह काका, भोपाल)
लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।








