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हमारे सभ्य समाज की ये अजब संजीदगियां

अनिल कर्मा | Mar 29, 2012, 00:17AM IST
 
 

भास्कर ब्लॉग. . क्या आपको लगता है कि ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ के अंत में शुरू हुआ मुन्नाभाई का अस्पताल अब भी कहीं चल रहा होगा? हादसे में घायल हुए किसी व्यक्ति को जहां प्यार की झप्पी देते हुए कोई कह रहा हो - ‘लेट जाओ मामू.. पहले इलाज हो जाए, फिर फारम भर लेंगे।’ शायद नहीं।


हाथ बंधे नियमों और आंखों पर पट्टी लगाए कायदों के बीच वह अस्पताल कहीं खो गया होगा। ‘थ्री इडियट्स’ का ‘रैंचो’ भी हो सकता है किसी स्कूल में ए फॉर एप्पल पढ़ा रहा हो (जैसा चतुर रामलिंगम को लगता था)। ऐसा इसलिए क्योंकि फिल्मों में तो हैप्पी एंड का रिवाज है।


किरदार तमाम संघर्ष के बाद मुकाम तक पहुंच ही जाते हैं, लेकिन समाज का शासक वर्ग इस दौर में किसी और रीत पर चल पड़ा है। ‘भाई’ की जुबान में सीधी-सपाट बात कहने वाला मुन्ना उसे कतई कबूल नहीं है और स्थापित मान्यताओं को चुनौती देने वाला रैंचो तो बर्दाश्त ही नहीं होता।

थोड़े-से समय के लिए रेल मंत्री रहे दिनेश त्रिवेदी को ही ले लें । उन्होंने लीक से थोड़ा-सा हटकर सोचा। रेलवे की हालत सुधारने के लिए यात्री किराया बढ़ा दिया। और हां, यह भी कि अपनी पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी का कहना नहीं माना। बस फिर क्या था। तमाम तरह की आवाजें उठने लगीं। अंगुलियां लहराने लगीं। ‘यही है दोषी, चढ़ा दो फांसी पर’ के अंदाज में उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर ढकेल दिया गया। उनकी जगह मुकुल रॉय आए। दूसरे ही दिन बढ़ा किराया वापस लिया और चल पड़ी सरकार की रेल। त्रिवेदी फेल, रॉय पास।


कायदे से (सरकार में र्ढे को ही कायदा कहा जाता है) त्रिवेदी को देखना था कि मतदाता नाराज न हो जाए, इस डर से पिछले दो रेल मंत्री आठ साल से यात्री किराया नहीं बढ़ा रहे थे। रेलवे का जो होना था हुआ, लेकिन वे दोनों बहुत अच्छे रहे। कामयाब और काबिल भी (सरकार ऐसा मानती रही, तभी तो वे टिके रहे।)। वैसे त्रिवेदी से ‘समझदार’ तो अपने मोंटेक सिंह निकले। हर दिन 32 रुपए खर्च करने वाले को अमीर मानने के उनके गणित का आम जनता में, बुद्धिजीवियों (गरीब टाइप के) में खूब विरोध हुआ था, लेकिन वे रहे सरकार के साथ ही।


अभी-अभी योजना आयोग के जो आंकड़े आए हैं, उनमें तो 28 रुपए रोज से ज्यादा खर्च करने वाले को ही उन्होंने अमीर घोषित कर दिया। गरीबी अचानक घट गई। दुनिया चिल्ला रही है, आंकड़े फर्जी हैं, सच्चई से दूर हैं। पर क्या फर्क पड़ता है। सरकार तो खुश है न, बस। मोंटेक तो बने हैं न, बात खत्म।

दरअसल ये ‘सभ्य’ समाज की कुछ ‘संजीदगियां’ हैं, जिन्हें जीवनभर जनहित याचिकाएं लगाने वाले त्रिवेदी जैसे लोग समझ नहीं पाते। यहां हर बात पर ‘सही बात है’ कहना होता है। मुलाकात कैसी भी रही हो, ‘नाइस मीटिंग’ बोलना पड़ता है। जो चल रहा है, उस पर गर्दन ऊपर-नीचे हिलाते हुए सहमति देनी पड़ती है। ना कहना मना है, असहमति अपराध और विरोध करना पाप। जेपी से अन्ना तक, इंजीनियर सत्येंद्र दुबे से लेकर आईपीएस नरेंद्र कुमार तक और डॉ. बिनायक सेन से लेकर इरोम शर्मिला तक सबको इसी कसौटी पर ‘खरा’ न उतर पाने के कारण अलग-अलग तरह से ‘दंड’ दिया जाता रहा है। आपत्ति एक ही है - ‘चुप क्यों नहीं रहते?’

इंदौर में पिछले दिनों हुए आकाशवाणी के एक साहित्यिक आयोजन में भी आलोचकों ने इस बात पर चिंता जाहिर की कि बाजार ने हमें अनुयायी बनना सिखा दिया है। समाज एकालापी झुंडों में तब्दील हो रहा है। आलोचना किसी को गवारा नहीं है। सचमुच आज अगर कबीर होते तो शायद साहित्य बिरादरी ही उन्हें हाथ पकड़कर फाइव स्टार होटल के एयर कंडीशंड ह़ॉल से बाहर छोड़ आती। ..और फिर शुरू होता चुटकुलेनुमा कवि सम्मेलन। भद्रजन पैग लगा-लगाकर ताली पीटते..‘क्या बात है’, ‘क्या बात है’ कहते। बात क्या है? इससे क्या फर्क पड़ता है। प्लीज आप भी कहिए न - सही बात है।
 
 
 

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