सांप-सीढ़ी की तरह है संतान को पालना
सभी अपनी संतानों को योग्य बनाना चाहते हैं। इसके लिए माता-पिता को बच्चों को रत्न की तरह तराशने की कला आनी चाहिए। आसपास के पत्थर हटाने आने चाहिए। खदान के पत्थर रत्न को छिपाए बैठे हैं। पत्थर हटे, रत्न निकला। लेकिन रत्न हाथ लग जाना ही काफी नहीं, उसकी कीमत तराशे जाने के बाद है। बाल मन तो मु_ी भरना जानता है और युवा हृदय बांहों में समेटने को बेताब रहता है। ऐसे में वे सिर्फ रुचि देखते हैं, अच्छाई या बुराई से उनको कोई लेना-देना नहीं रहता। दूसरों की राय इन्हें रुकावट लगती है। ऐसे में इनके जीवन में सावधानी से प्रवेश करना होगा। बेहद धैर्य और आत्मीयता की क्षमता से संपन्न माता-पिता ही अपनी संतानों के जीवन में दखल रख पाएंगे। अधिकार, हक और पद को लेकर चले तो निराशा ही हाथ लगेगी। बचपन उतना सरल रहा नहीं; जवानी और रहस्यमयी हो गई, ऐसे में ये इनकी गुफाओं में हमें और भटका देंगे। संतान का लालन-पालन सांप-सीढ़ी के खेल की तरह है। इसमें बच्चों को माता-पिता कभी सीढ़ी नजर आते हैं तो कभी सांप। ऐसे ही बच्चे भी मां-बाप की नजर में हो जाते हैं। आजकल देखा जा रहा है कि बच्चों को पालने में मां-बाप थके जा रहे हैं। मध्य आयु के अधिकंाश माता-पिता की बीमारियों का कारण और केंद्र उनके बच्चे बन गए हंै। अनेक बार वे उदास, हताश और थके हुए नजर आते हैं। पहली बात तो यह कि लालन-पालन की यह यात्रा कभी बंद न करें और थकान आए तो थोड़ा आराम कर लें और फिर चल पड़ें। शायद ऐसा दौर आएगा कि इस नई पीढ़ी को उनके जन्म से और आपके अंत तक आपको पालना-पोसना पड़ेगा।
-पं. विजयशंकर मेहता






