विपरीत परिस्थिति में भी कीचड़ में कमल की तरह खिले रहें
Source: पं. विजयशंकर मेहता | Last Updated 00:27(10/02/12)
नवजात शिशुओं की इंद्रियों की स्थिति एक जैसी होती है। आधि-व्याधि के कारण कुछ अपवाद को छोड़ दें तो जन्म के समय और मौत के वक्त सभी देह एक जैसी रही है। पैदा होने के बाद धीरे-धीरे हालात बदलते हैं, लालन-पालन, माता-पिता, समाज-खानदान के द्वारा दिए गए सुख-दुख, सुविधा-दुविधा, अभाव और सहयोग से मनुष्य का व्यक्तित्व बदलने लगता है।
धीरे-धीरे जैसे ही समझ बढ़ती है, पहली चुनौती यह सामने आती है कि यदि जीवन में सुविधाएं हैं और आप बन गए तो यह एक सामान्य प्रक्रिया होगी, लेकिन यदि अभाव हो, संघर्ष हो, विपरीत परिस्थिति हो और उसके बाद भी हम कुछ बन जाएं, तब लगेगा जीवन जिया। भारतीय संस्कृति ने कमल के फूल को बड़ा महत्व दिया है।
इसके पीछे एक बहुत अच्छा दर्शन है। कमल का फूल विपरीत परिस्थितियों में खिलता है। कीचड़ में रहकर भी उसकी प्रतिष्ठा है। खूबसूरती उसकी भी निर्दोष है। कमल का फूल एक संदेश देता है कि आपको जीवन में कितना और क्या मिला, इससे ज्यादा जरूरी यह है कि उस मिलने की क्रिया में आप कितने प्रसन्न और सहमत रहे।
जिंदगी में कितना ही उल्टा-सीधा घट जाए, आपको खिलना ही है। हर सफलता आपका सृजन है। कीचड़, जल और सूर्य की किरणों अलग-अलग शक्लों में हमारे सामने आएंगी ही, लेकिन हमें हर हाल मंे कमल बनकर न सिर्फ खिलना है, बल्कि परमात्मा के लिए पुष्पांजलि का गौरव भी प्राप्त करना है। एक और बात, कमल के फूल की नाल बड़ी लंबी होती है। खिले हुए व्यक्तित्व अगर गहरे हो जाएं तो उन्हें परमात्मा तक पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता।