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जोश को अध्यात्म का होश जरूरी

पं. विजयशंकर मेहता | Jan 07, 2013, 00:08AM IST
 
 

संसार में रहते हुए कुछ व्यावहारिक नियम-कायदे और कानूनों का पालन करना पड़ता है। समाज में उसके संविधान के अनुसार जीना पड़ता है। यहां भावावेश से काम नहीं चलता। लेकिन अध्यात्म जगत में नियम बहुत बंधे हुए नहीं होते।
 
यहां का सारा मामला चलता है जागरूकता और होश से। कभी-कभी सिद्धांत और नीतियां यहां काम नहीं आतीं। यहां बोध की प्रमुखता है। सिद्धांत बाहर से आते हैं, बोध भीतर से आता है। बाहर कामयाब होने के लिए जोश की जरूरत होती है और जैसे ही हम अध्यात्म से जुड़ते हैं, जोश के साथ होश भी काम करने लगता है।
 
संसार में जिसे जोश कहा जाता है, अध्यात्म में उसकी बड़ी सावधानी से परिभाषा की गई है। हर इंसान के भीतर एक भाव तत्व होता है। जब इसका संतुलन बिगड़ता है तब आदमी जोश में काम करने लगता है। भाव तत्व संतुलित रहें तो मनुष्य सरल, सहज और सरस होता है। इसे ही होश कहेंगे। इसके असंतुलित होते ही जोश होता है, वह बिना होश का होता है।
 
एक तरह से यूं समझ लें कि जो लोग अपनी शक्ति को संतुलित रखकर संभाल नहीं पाते, उनकी शक्ति ऐसे जोश में बदल जाती है और फिर किए हुए काम पर उन्हें पछताना पड़ता है। जिनका भावावेश संतुलित होता है, उनका मनोबल बढ़ा हुआ रहता है।
 
जब किसी को बुखार आता है तो उसका शरीर गर्म हो जाता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि शरीर की गर्मी बाहर निकल रही है, बल्कि सही अर्थ यह है कि शरीर की गर्मी असंतुलित हो गई है। स्वस्थ व्यक्ति की गर्मी भीतर रहकर स्वास्थ्य को संतुलित बनाती है। ऐसे ही असंतुलित भाव, भावावेश बन जाता है। इसलिए संसार के जोश को अध्यात्म का होश जरूरी है। 
 
 

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