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काका कालेलकर की अनूठी पैथी

Bhaskar News | Dec 22, 2012, 00:44AM IST
 
 

काका  साहब कालेलकर उच्च कोटि के चिंतक, लेखक व शिक्षाविद होने के साथ ही गांधी विचार के प्रमुख व्याख्याता थे। उनकी सोच प्रत्येक विषय पर बहुत गहन और व्यापक होती थी। एक बार काका अस्वस्थ हो गए।
 
यह बहुत स्वाभाविक ही था कि उनकी अस्वस्थता के विषय में खबर लगते ही बड़ी संख्या में उनके मित्र व शुभचिंतक उनसे मिलने आए। काका सभी से बड़ी आत्मीयता से भेंट करते थे। एक दिन काका से मिलने उनके कुछ मित्र आए। बातचीत के बीच में किसी अन्य मित्र का फोन काका के पास आया। उन्होंने काका से पूछा - ‘मैंने आपकी बीमारी के बारे में सुना। बहुत चिंता हुई। अब कैसे हैं?’ काका बोले - ‘हां, स्वास्थ्य कुछ खराब हुआ था, किंतु जबसे मैंने नई पैथी (चिकित्सा) की है, मुझे बहुत लाभ हुआ है।’
 
मित्र ने उत्सुकतावश उस नई पैथी के विषय में जानना चाहा, तो काका बोले- ‘मैंने रोग के विषय में सोचना ही छोड़ दिया और यही पैथी मेरे लिए कारगर सिद्ध हुई। किसी की मेहमाननवाजी करो, तो वह प्रसन्न होकर अधिक दिन तक घर में टिकता है। इसके ठीक विपरीत उसे घर का मान लो, तो मेहमान जैसा सत्कार उसे नहीं मिलता। तब वह उस घर को छोड़कर किसी ऐसे घर की तलाश में चला जाता है, जहां उसका स्वागत मेहमान जैसा हो। रोग के विषय में भी यही बात लागू होती है।’
 
 
काका की नई पैथी पर उन मित्र सहित सभी उपस्थित जन सहमत हुए बिना न रह सके। वस्तुत: रोग से अधिक उसकी चिंता तनाव बढ़ाती है। अत: किसी भी प्रकार की शारीरिक अस्वस्थता में सकारात्मक सोच बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
 

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