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नेकी और जीत का नाता

 
Source: खुशवंत सिंह   |   Last Updated 00:08(31/12/11)
 
 
 
 
भारतीय और विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में भारत-पाक युद्धों पर विस्तार से लिख चुकने के बावजूद मैं उन दो व्यक्तियों का कभी उल्लेख नहीं कर पाया, जिन्होंने इन दोनों पड़ोसी मुल्कों के बीच होने वाले संघर्षो में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था। वे थे : मौलाना भाशानी और जनरल टिक्का खान।

1971 की जंग शुरू होने से बहुत पहले ही मौलाना भाशानी हिंदुस्तान में शरण ले चुके थे, लेकिन बाद में वे स्वतंत्र बांग्लादेश चले गए। उन्हें हिंदुस्तान का ऋणी होना चाहिए था। लेकिन हुआ इससे ठीक उलट। बांग्लादेश लौटते ही वे फिर हिंदुस्तान के बारे में बेसिरपैर की बातें करने लगे।

इसी दौरान मेरा ढाका जाना हुआ। मैं राजधानी से ४क् मील दूर स्थित उनके गांव में उनसे मिलने पहुंचा। वे जमीन पर बैठकर ग्रामीणों से बतिया रहे थे। मैंने उनका अभिवादन करते हुए कहा : ‘सलाम वलैकुम, मौलाना साहिब।’ उन्होंने ऊपर देखा और कहा : ‘बरखुरदार, मुझसे बात करने आए हो?’ मैंने जवाब दिया : ‘जी।’

फिर मैंने उनसे पूछा : ‘आप हिंदुस्तान की लानत-मलामत क्यों करते हैं, जबकि हिंदुस्तान ने आपको आजादी दिलाई है?’ इस पर उन्होंने हिंदुस्तान पर इल्जाम लगाते हुए कहा : ‘इस मुल्क ने बांग्लादेश को लूटा है’ और फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मुझे इसके सबूत चाहिए? मैंने जवाब दिया : ‘जी हां, कोई भी बात कहने के बाद उसके सबूत भी देने चाहिए।’ उन्होंने पूछा : ‘क्या तुम यह कहना चाहते हो कि पाकिस्तान ने बांग्लादेश को लूटा है?’

मैंने कहा : ‘बेशक, मैं यही कहना चाहता हूं, क्योंकि आप ही ने तो पूरी दुनिया को बताया था कि पाकिस्तान ने आपको लूट लिया है।’ उन्होंने कहा : ‘मैं ऐसा इसलिए कहता था कि हिंदुस्तान ने बांग्लादेश में तैनात पाकिस्तानी फौज को कब्जे में ले लिया था। सभी ९३ हजार पाकिस्तानी फौजी। तो बताओ लुटेरों का लुटेरा कौन हुआ?’ इस पर मैं चुप रह गया।

एक साल बाद मैं इस्लामाबाद में था। मैं जनरल टिक्का खान से मिलना चाहता था, लेकिन उन्होंने मुझसे मिलने से इनकार कर दिया। मैंने पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री और मेरे मित्र मंजूर कादिर से कहा कि वे जनरल को मनाएं। उन्होंने ऐसा ही किया और आखिरकार मैं जनरल के निवास पर उनसे मिलने पहुंचा। वे बहुत प्रभावी शख्सियत के धनी नहीं थे।

वे मंझोले कद के थे और देखने में किसी बैंक क्लर्क या दुकानदार की तरह लगते थे। उनके व्यक्तित्व में ऐसा कुछ नहीं था, जिसे देखकर उन्हें जनरल कहने को जी करे। हिंदुस्तान के प्रति उनके मन में बहुत कड़वाहट भरी हुई थी। उन्होंने मुझसे कहा : ‘हिंदुस्तान में मुझे एक हत्यारे की तरह प्रचारित किया गया, लेकिन मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि मेरे सिपाहियों ने हमेशा नेक मुस्लिमों की तरह बरताव किया है।’

मैंने पूछा : ‘यदि ऐसा था तो वे हिंदुस्तान से लड़ क्यों नहीं पाए? आपने तो दावा किया था कि पाकिस्तान का एक-एक सिपाही हिंदुस्तान के दस सिपाहियों के बराबर है। फिर ऐसा क्या हुआ कि आपकी फौज को हिंदुस्तान ने नाकों चने चबवा दिए?’ जनरल का अर्दली एक लहीम-शहीम पठान था। उसने बीच में दखल देते हुए कहा : ‘अवाम हमारे खिलाफ हो गया था।’ मैंने कहा : ‘यदि अवाम तुम्हारी फौज के खिलाफ हो गया था तो ऐसा होने की कुछ ठोस वजहें रही होंगी।’

बहुत देर तक खामोशी छाई रही। फिर मैंने कमरे में लगी एक तख्ती की ओर इशारा किया, जिस पर पवित्र धर्मग्रंथ की एक पंक्ति लिखी हुई थी। मैंने पूछा : ‘इस पंक्ति का क्या मतलब है?’ जनरल ने कहा : ‘जीत उन्हीं को नसीब होती है, जिनकी मंशा नेक हो।’ मैंने तपाक से कहा : ‘हिंदुस्तान की जीत की भी ठीक यही वजह थी।’

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यूरिन थैरेपी :

जब पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने मुझे बताया था कि अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्वमूत्र सेवन करना चाहिए तो मैं हैरान रह गया था। हमारे यहां गोमूत्र को पवित्र माना जाता है और मैंने सुना है कि कुछ लोग गोमूत्र का सेवन भी करते हैं। लेकिन अब जाकर मुझे पता चला है कि स्वमूत्र सेवन केवल हमारे यहां ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में प्रचलित है। ‘प्राइवेट आई’ पत्रिका के ‘फनी ओल्ड वर्ल्ड’ कॉलम में मैंने हाल ही में एक बड़ा रोचक वृत्तांत पढ़ा। वह कुछ इस तरह है :

‘न्यूजीलैंड के अग्रणी राजनीतिक दल के केविन गार्डनर ने एक रिपोर्टर को बताया : ‘हममें से अधिकांश लोगों ने जीवन में कभी न कभी मूत्रत्याग के लिए किसी झाड़ी की आड़ का सहारा लिया होगा, लेकिन हममें से कितने लोग ऐसे होंगे, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से टीवी के समक्ष स्वमूत्र सेवन किया हो? महाशय जो ग्लेन ऐसे ही सज्जन हैं, लेकिन मैं यह कहना चाहूंगा कि न्यूजीलैंड के बहुतेरे लोग उनकी हर हरकत से बहुत खुश नहीं हुए होंगे।

और इसीलिए हम यह घोषणा करते हैं कि वे अब हमारी पार्टी के उम्मीदवार नहीं हैं। अलबत्ता यह भी संभव है कि उनकी राजनीतिक नैया को इस तरह मझधार में छोड़ देने के हमारे इस कृत्य से भी लोग बहुत प्रभावित नहीं हुए हों, लेकिन अब क्या कहें, कुछ विवशताएं होती हैं। हमारी स्थिति कुछ ऐसी है कि हमें चेक और डबल चेक करते रहना पड़ता है। हम किसी भी तरह के विवाद में नहीं पड़ना चाहते। एक राजनीतिक दल के रूप में हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता यही है कि हमारी सार्वजनिक छवि पाक-साफ हो।’

लेकिन जब उनहत्तर वर्षीय जो ग्लेन से बात की गई तो उन्होंने हैरत जताते हुए कहा : ‘मैं तो जनता की सेवा करना चाहता था, लेकिन पता नहीं मुझे क्यों निकाल बाहर कर दिया गया। मैं पिछले कई वर्षो से दिन में एक गिलास स्वमूत्र सेवन करता आ रहा हूं, क्योंकि मुझे आर्थराइटिस की शिकायत है और इससे मुझे आराम मिलता है।

इसलिए पिछले माह जब मुझे उस टीवी कार्यक्रम में निमंत्रित किया गया, तो मैंने अपनी बीमारी के बारे में बात करते हुए अपनी घरेलू चिकित्सा का सार्वजनिक प्रदर्शन भी किया। मैंने कोई राजनीतिक बयान नहीं दिया था, फिर भी पार्टी प्रमुख विंस्टन पीटर्स ने मुझे बाहर का रास्ता दिखा दिया।’ बहरहाल, इस घटना से तो यही लगता है कि अब समय आ गया है कि चिकित्सा विज्ञान यूरिन थैरेपी के बारे में गंभीरता से विचार करना शुरू कर दे। -लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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