हवाई होता उडऩे का सपना
किंगफिशर एयरलाइंस का लाइसेंस निलंबित होने के बाद इस विमान सेवा कंपनी के संकट से उबरने की उम्मीदें टूटने लगी हैं।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण खबर यह है कि इसके मालिक एयरलाइन एवं उसके कर्मचारियों की मुसीबत से लापरवाह बने रहे हैं। नागरिक विमानन महानिदेशालय ने कई दिन पहले अपने इस इरादे का इजहार कर दिया था कि कंपनी ने अपने तौर-तरीके नहीं सुधारे तो उसका लाइसेंस निलंबित कर दिया जाएगा।
उसके पहले एयरलाइन के एक कर्मचारी की पत्नी ने अपने पति को चार महीने से वेतन न मिलने से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। दरअसल, पिछले महीने से ही इस एयरलाइन का संकट गहराने लगा और एक अक्टूबर से उसकी उड़ानें बंद हो गईं। आश्चर्यजनक है कि इसके बावजूद प्रबंधन ने हालात को संभालने की किसी कोशिश का संकेत नहीं दिया। इस रूप में किसी भी कारोबार के लिए किंगफिशर एयरलाइंस के प्रबंधन ने एक खराब मिसाल कायम की है।
इसका परिणाम कंपनी एवं उसके कर्मचारियों को तो भुगतना ही होगा, लेकिन इसके असर से आम विमान यात्री भी नहीं बच सकेंगे। इस घटनाक्रम से यह संदेश गया है कि नागरिक विमानन के कारोबार में मुनाफा नहीं है। इससे सबक लेकर विमान सेवा चला रहीं दूसरी कंपनियां यात्री सेवाओं में कटौती और यात्रा किराए में वृद्धि करेंगी- यह अनुमान आम है।
एक एयरलाइन के आसमान से हट जाने से इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा घटेगी, जिसका लाभ उठाने के लिए दूसरी विमान कंपनियां प्रेरित होंगी, यह अंदाजा भी लगाया गया है। भारत में पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से सस्ती विमान सेवाओं का प्रसार हुआ, उसके बाद विमान यात्रा सिर्फ अति धनी वर्ग की सुविधा नहीं रह गई, बल्कि यह मध्य वर्ग के एक बड़े हिस्से की पहुंच में आ गई।
अनुमान यह था कि धीरे-धीरे और भी ज्यादा लोग इस सेवा का उपयोग करने लगेंगे। लेकिन पहले तो मंदी, फिर पेट्रोलियम के बढ़ते दाम और अब एक एयरलाइन के लगभग बंद होने की स्थिति में पहुंच जाने से ऐसी उम्मीदों को धक्का लगा है। कहा जा सकता है कि हवाई जहाजों का पहिया उल्टी दिशा में चल पड़ा है। यानी एक कंपनी के कुप्रबंधन की कीमत बड़ी संख्या में विमान यात्री भी चुकाएंगे।






