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चलें अपने सपनों की राह

प्रीतीश नंदी | Aug 02, 2012, 01:20AM IST
 
 

मैंने साठ के दशक में अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता (अब कोलकाता) के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया, जो उस वक्त वहां का सर्वाधिक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान था या कहें कि अब भी है। बहरहाल, मैं एक नेशनल साइंस स्कॉलर था।

हालांकि मुझे साइंस पढ़ना जरा भी नहीं सुहाता था, इसके बावजूद इसमें दाखिला लेने की एक वजह यह थी कि मुझे कॉलेज में इसी के जरिए छात्रवृत्ति मिल सकती थी। मुझे छात्रवृत्ति के तहत मासिक तौर पर पचास रुपए मिलते थे। हालांकि आज के हिसाब से यह बहुत छोटी रकम लगती है, लेकिन उस वक्त यह मेरे लिए बहुत मायने रखती थी। मेरी उम्र उस वक्त सोलह साल की रही होगी और मेरे माता-पिता रिटायर्ड स्कूली शिक्षक/शिक्षिका थे।

जब मैं कॉलेज में पढ़ रहा था, उसी दौरान नक्सलवादी आंदोलन शुरू हो गया। इस आंदोलन के प्रभाव से हमारा प्रेसीडेंसी कॉलेज भी अछूता नहीं रहा। कॉलेज के मेरे कई संगी-साथी चुपचाप एक ऐसी लड़ाई लड़ने के लिए निकल पड़े, जिसके बारे में संभवत: उन्हें भी लगता होगा कि वे कभी नहीं जीत सकते। हालांकि मैं कोई मार्क्‍सवादी नहीं हूं, लेकिन कहीं न कहीं मुझे भी यह लगा कि उनका दिल सही जगह पर था। वे आदर्शवाद के दिन थे। उन दिनों कोई भी कॅरियर व वेतन-पारिश्रमिक इत्यादि की बात नहीं करता था। हमारे मन-मस्तिष्क पर उन दिनों चे ग्वेरा छाए हुए थे। हम वियतनाम की बातें करते थे। हम हर तरीके की जंग लड़ना और जीतना चाहते थे।

यही वह दौर था, जब मुझे कविताएं लिखने का चस्का लगा। मेरे मन में लेखक बनने की धुन सवार थी। लिहाजा एक दिन मैंने कॉलेज बंक किया और उस जॉब के लिए इंटरव्यू देने पहुंच गया, जिसका विज्ञापन मैंने कुछ दिनों पहले पढ़ा था। इसकी अगली सुबह मैं बैंटिक स्ट्रीट पर एक दिहाड़ी नौकरी कर रहा था। मैंने इस जॉब को इसलिए चुना क्योंकि इससे मुझे रात में लिखने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता था। इसके साथ ही मेरे कॉलेज की पढ़ाई के दिन पूरे हो गए। लेकिन मेरा यकीन मानिए, मैंने इसे एक पल के लिए भी मिस नहीं किया।

अलबत्ता मेरा तो यह मानना है कि यह संभवत: मेरे द्वारा अब तक लिया गया सर्वाधिक समझदारीपूर्ण निर्णय था। मैंने खूब लिखा, तस्वीरें खींचीं और दूसरों के लिए कुछ सामग्री वगैरह भी तैयार की। इतना ही नहीं, मैंने अपनी २२५ रुपए मासिक तनख्वाह में से कुछ रुपए बचाकर एक सामयिक काव्य पत्रिका शुरू की, जिसमें मैं देश के चुनिंदा बेहतरीन लेखकों की रचनाएं प्रकाशित करता था। ऐसा करने वाला मैं अकेला नहीं था। मेरे समकालीन कई लोग इसी तरह कुछ न कुछ रोमांचक काम कर रहे थे। वे बगैर किसी सुरक्षा जाल के जिंदगी के इस मैदान में कूद पड़े और उन सभी ने बहुत अच्छा काम किया।

आज मैं जहां पर भी हूं, वहां तक सिर्फ इसलिए पहुंच पाया क्योंकि उस वक्त मैंने अपने दिल की आवाज सुनी और कॉलेज को त्यागते हुए उस काम को चुना, जो मैं वास्तव में करना चाहता था। हालांकि मुझे प्रेसीडेंसी कॉलेज और वहां के अपने मित्रों से लगाव था, लेकिन अपनी आजादी इससे भी ज्यादा प्यारी थी और इसने मुझे जिंदगी में एक ऐसी शुरुआत दी, जिससे मैं अलग तरह के सपने देख व उन्हें पूरा कर पाया। अकादमिक्स के साथ इस ब्रेक ने मुझे अपने अतीत से भी विलग होने के लिए मजबूर कर दिया। अब मैं अपनी उम्मीद से कहीं अधिक जोखिम उठाने के लिए तैयार था।

यही कारण है कि जर्मन मूल के अमेरिकी उद्यमी और ‘पेपल’ के सह-संस्थापक पीटर थिएल ने जो किया, उसकी मैं दिल से सराहना करता हूं। पीटर ने एक ऐसा फाउंडेशन बनाया है, जो अकादमिक उत्कृष्टता को पुरस्कृत करने (जैसा कि ज्यादातर फाउंडेशन करते हैं) के बजाय इसके ठीक उलट काम को प्रोत्साहित करता है। यह बीस साल से कम उम्र के युवाओं को कॉलेज की पढ़ाई बीच में छोड़कर अपने सपनों को पूरा करने की राह पर निकलने के लिए प्रेरित करता है। इसके लिए थिएल ने फेलोशिप कार्यक्रम चलाया है, जो इन युवाओं को दुनिया बदलने वाले स्वप्नद्रष्टा बनने के लिए 1,00,000 डॉलर देता है। यह फेलोशिप कार्यक्रम युवाओं को यह मौका देता है कि वे अकादमिक्स के चंगुल से छूटकर और सिस्टम से बाहर निकलते हुए अपने सृजनात्मक और उद्यमशीलता की समझ के साथ बगैर समय गंवाए आगे निकल पड़ें।

थिएल ऐसे युवाओं से सिर्फ दो चीजों की उम्मीद करते हैं। पहली, वे नजर बचाकर कोई अंशकालिक कोर्स न करें। दूसरी, उन्हें अपने सपनों को साकार करने के लिए पूरे समय काम करना होगा। थिएल का मानना है कि इतनी कम उम्र में सीखने की बंधी-बंधाई परंपरा से मुक्त युवाओं की पूर्ण एकाग्रता विभिन्न क्षेत्रों में नए-नए विचारों को प्रोत्साहित करेगी, जिससे आखिरकार हमारे जीवन में भी बदलाव आएगा। हर क्षेत्र स्मार्ट, स्वस्फूर्त और नई सोच रखने वाले नए युवाओं से लाभान्वित हो सकता है। औपचारिक शिक्षा को लांघते हुए ये युवा उस तरह से सोच सकेंगे, जैसा वे सोचना चाहते हैं। न कि वे उस तरह सोचेंगे, जैसा हम उनसे उम्मीद करते हैं।

मेरा मानना है कि हमारे यहां भी कुछ फाउंडेशन संस्थाओं को ऐसा करना चाहिए। हमारे यहां नौकरियों की गलाकाट स्पर्धा की तरह अकादमिक चूहा दौड़ भी लोगों की आत्मा को मार रही है। इसे बढ़ावा देने के बजाय ये फाउंडेशन युवाओं को अपना विशिष्ट हुनर, विशिष्ट व्यक्तित्व खोजने की दिशा में प्रोत्साहित कर सकते हैं। इस तरह की फेलोशिप उनके लिए काफी सुकूनदायक हो सकती है, जिससे वे अपने उन विचारों पर ध्यान लगा सकेंगे, जिन पर वे वास्तव में काम करना और जिन्हें फलीभूत होते देखना चाहते हैं। जॉब मार्केट लगातार सिकुड़ रहा है। ऐसे में इस तरह के प्रयासों से उद्यमिता व प्रयोगधर्मिता का नया दौर शुरू हो सकता है और युवाओं को एक त्वरित शुरुआत मिल सकती है। यह शुरुआत माउंट किलिमंजारो पर चढ़ाई करने, कोई वाद्ययंत्र सीखने या फिर मेरी तरह कोई किताब या कविता लिखने की तरह कुछ भी हो सकती है। आइडिया कुछ नई शुरुआत करने का होना चाहिए। बाकी चीजें अपने आप ठीक हो जाएंगी।


लेखक वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार हैं।
 
 
 

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