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किस बात पर हंसें और किस पर रोएं

 
Source: एम.जे. अकबर   |   Last Updated 00:45(16/10/11)
 
 
 
 
बायलाइन . जब मैंने जाना कि सतना में लालकृष्ण आडवाणी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की खबर देने के लिए जुटाए गए पत्रकारों को कुछ उत्साही पदाधिकारियों ने 500 रुपए के नोट वाले लिफाफे बांटे, तब मैं जरा भी तय नहीं कर पाया कि इस खबर के किस हिस्से ने मुझे हंसाया और किस हिस्से ने रुलाया। यह श्री आडवाणी की गलती नहीं है, वे तो प्रचलित व्यवस्था के पीड़ित हैं। बहरहाल, यह गहरे ज्वालामुखी का एक हिस्सा भर है।

लेकिन हंसी एक बेहद सड़ चुके केक के ऊपर मिठास की पतली परत की तरह है और केक है मीडिया। पत्रकार वाकई बुलाए नहीं, जुटाए गए थे। पहले की मोलतोल से तय हुई कीमत 500 रुपए प्रत्येक के आधार पर उन्हें भुगतान किया गया था। झिंझोड़ने वाली बात यह थी कि किसी ने भी लेने से इंकार नहीं किया।

यह कोई अकेली घटना नहीं थी। स्पष्ट है कि यह सतना में चलने वाला रेट है। लेकिन यह कल्पना मत कीजिए कि यह सतना तक ही सीमित है। जहां तक पत्रकारों को उनके जीवनस्तर के आधार पर उपकृत कर खुश बनाए रखने की बात है, तो गिने-चुने शहर ही दिल्ली की तरह भ्रष्ट हैं। मीडियाई कबीले के मध्य निजी बातचीतों में सिर खाने वाला ज्यादा व्यंग्यपूर्ण विचार संभवत: यही होगा कि उन पत्रकारों ने खुद को इतना सस्ता क्यों बेचा?

यह घटना भारतीय राजनीतिज्ञों की बजाय भारतीय पत्रकारों के बारे में बहुत कुछ कहती है। यह कम से कम मेरे लिए तो लंबे समय तक सुबकने की पर्याप्त वजह है। समस्या कम वेतन पाने वाले मुट्ठीभर पत्रकारों को प्रलोभन देने तक ही सीमित नहीं है। यहां अखबारों के मालिक हैं, जो पत्र प्रतिनिधियों को वेतन देने की बजाय उनसे रखे जाने के बदले मिल्कियत मुद्रा मिलने की उम्मीद करते हैं। ‘पेड न्यूज’ का अर्थ सत्ता-शक्ति संपन्न शख्स के बारे में अच्छी बातें लिखना भर नहीं है। ज्यादा पैसा तो खबर न देकर बनाया जा सकता है। कुछ उदाहरणों में यह बीमारी बहुत शीर्ष तक फैली हुई मिली है।

राहत की बात है कि ऐसे उदाहरण गिनेचुने ही हैं। मैं गारंटी दे सकता हूं और मुझे अपने रिपोर्टरों, उप संपादकों, संपादकों समेत तमाम सहकर्मियों पर गर्व है, जो जेब में लिफाफा डालने के सपने नहीं देखते। एक हालिया मामले में टीवी न्यूज के एक संपादक ने गंभीर धमकियों और सत्ताधारियों की ओर से मिले प्रलोभनों, दोनों के सामने झुकने से इंकार कर दिया। इतनी ही या शायद इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि उसकी कंपनी के मालिकों ने उसका पूरा समर्थन भी किया। यह अच्छी पत्रकारिता और फौलादी साझेदारों की दिल खुश कर देने वाली मिसाल है और स्वतंत्र मीडिया के लिए आदर्श गारंटी। सभी नेता भ्रष्ट नहीं हैं।

डॉ. मनमोहन सिंह और श्री आडवाणी, दोनों का पांच दशकों का सार्वजनिक जीवन रहा है और उनके नाम पर कोई धब्बा नहीं है। लेकिन राजनीति और मीडिया, दोनों में पकड़े गए लोगों के बिकाऊपन ने लोकतंत्र के लिए जरूरी दो संस्थाओं की साख को चट कर लिया है। ये हैं, संसद और मीडिया। पहला जनता की गहन तहकीकात के तले है। दूसरा अत्यावश्यक व्यापक बहस का पात्र है।

इस बहस में हमारी व्यवस्था के सबसे विशालकाय पेड न्यूज- ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन को शामिल किए जाने की दरकार है। उनके प्रधान संपादक केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री हैं। रेडियो और दूरदर्शन में कार्यरत पत्रकार इसे अपने काम की शर्त के तौर पर स्वीकार करते हैं।

यहां आज के ऑल इंडिया रेडियो न्यूज बुलेटिन से एक दृष्टांत है, जिसे मैंने यह स्तंभ लिखते हुए सुना। रेडियो बड़ी वफादारी से इस तथ्य का जश्न मना रहा था कि मुद्रास्फीति 10 प्रतिशत से नीचे तक पहुंच चुकी है। जबकि, कोई संतुलित खबर इस बात पर भी आश्चर्य जताती कि यह क्यों अब तक इतनी ऊंची थी, जब सरकार बरसों से वादा करती रही कि मुद्रास्फीति घटने ही वाली है। बेशक, यह बहुत सौम्य सा उदाहरण है। सरकारी पत्रकार पक्षपाती निष्ठा पर जरा भी वक्त बर्बाद नहीं करते। जब सत्तारूढ़ दल बदलता है, उनका जोर और विलोपन भी स्थानांतरित हो जाता है।

इस तरह की लगाम के साथ सरकारें पूरी तरह से आरामदेह महसूस करती हैं। उनके संदर्भ में उनके तर्क युक्तियुक्त प्रतीत होते हैं। अपने मीडिया की संपादकीय नीतियों पर सरकार उतना ही ज्यादा अधिकार रखती है, जितना कि कोई अन्य मीडिया सामंत। यह कपटपूर्ण है।

ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन को मंत्रियों ने निजी निवेश से निर्मित नहीं किया है और न ही वे घाटे की भरपाई अपनी जेब से करते हैं। उन्होंने करों की राशि को हथिया लिया है और इसे व्यक्तिगत शक्ति का स्रोत बना लिया है। दूरदर्शन सार्वजनिक क्षेत्र का मीडिया है, न कि सरकारी चैनल।

इसका स्वरूप जनहित के जरिए तय हुआ है, न कि सरकारी तरफदारी से। प्रेस परिषद के नए चेयरमेन स्पष्टवक्ता न्यायमूर्ति मरकडेय काटजू हैं, जो हाल ही में सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हुए हैं। असंयम पर कुछ सचेतक टिप्पणियां करके वे बहस में शामिल हो चुके हैं। उन्हें बहस का फलक विस्तारित करना चाहिए, ताकि मीडिया का वर्तमान संकट भाव-विरेचन के अवसर में बदल जाए।

न तो संसद और न ही मीडिया नियम के विचार को पसंद करते हंै। जब सांसदों को लगता है कि सुप्रीम कोर्ट उनके क्षेत्र में दखल दे रहा है, तो उन्हें गुस्सा आता है। मीडिया तो अपने विशेषाधिकारों को लेकर और भी सतर्क है। लेकिन यदि दोनों ही अधिकारों को नहीं खोना चाहते, तो उन्हें अपने कर्तव्यों पर फिर से गौर करना होगा और स्वनियमन का तरीका खोजना होगा, जो समझौता करने वालों को दंडित करेगा। अन्यथा हंसने के लिए तो कुछ नहीं बचेगा और विलाप के लिए बहुत कुछ होगा। - लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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