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स्वतंत्रता बनाम उत्तरदायित्व

Bhaskar News | Aug 18, 2012, 00:05AM IST
 
 

प्रधान न्यायाधीश एसएच कपाड़िया ने प्रस्तावित न्यायिक प्रतिमान एवं उत्तदायित्व कानून से न्यायपालिका की स्वतंत्रता में दखल की आशंका जताते हुए शासन के तीनों अंगों के बीच संतुलन के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ी है। उन्होंने कहा कि जज उत्तरदायित्व से नहीं डरते, लेकिन इस बारे में कानून बनाते समय न्यायिक स्वतंत्रता का ख्याल नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए।

उन्हें अंदेशा है कि कहीं ऐसा कानून न पास हो जाए, जिससे भविष्य में पछताना पड़े। जस्टिस कपाड़िया न्यायपालिका की अनियंत्रित स्वतंत्रता के पक्षधर नहीं हैं, बल्कि समय-समय पर उन्होंने न्यायपालिका को आगाह किया है कि वह अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन न करे। स्वतंत्रता दिवस पर अपने उद्बोधन में भी उन्होंने कहा, ‘कभी-कभी न्याय करने की चिंता में हम ऐसी व्याख्याएं कर देते हैं, जिससे शासन के तीनों अंगों के बीच संतुलन बिगड़ सकता है।’

उन्होंने ध्यान दिलाया कि ‘हम (भारत के) लोग’ और ‘कानून के शासन’ से संबंधित अवधारणाएं व्यापक हैं। न्यायपालिका को यह ध्यान में रखते हुए ही इनकी व्याख्या करनी चाहिए, ताकि व्यवस्था का आंतरिक संतुलन कायम रहे। इसीलिए आवश्यक है कि जस्टिस कपाड़िया की आशंकाओं पर ध्यान दिया जाए। बेहतर होगा कि लोकसभा में पास हो चुके इस विधेयक को राज्यसभा में लाने से पहले सरकार प्रमुख न्यायविदों की राय ले, जैसाकि प्रधान न्यायाधीश ने सुझाव दिया है।

बहरहाल, यहां यह अवश्य ध्यान दिलाया जाना चाहिए कि प्रस्तावित कानून की पृष्ठभूमि यह धारणा गहराने के कारण बनी कि न्यायपालिका विधायी, नीति-संबंधी और यहां तक कि प्रशासनिक मामलों में भी अपना दखल बढ़ा रही है। संविधान के बुनियादी ढांचे और मूल अधिकारों के रक्षक के रूप में अपनी भूमिका की उसने इतनी विस्तृत व्याख्या कर ली है कि शासन के लगभग तमाम क्षेत्रों में उसने पांव फैला लिए हैं। जजों की नियुक्ति, अवमानना और महाभियोग से जुड़े प्रावधान न्यायपालिका को किसी तरह की जवाबदेही से बाहर रखते हैं। ये शिकायतें दूर होनी चाहिए। इन मुद्दों पर अगर व्यापक सहमति बने, तो फिर उत्तरदायित्व कानून से जुड़ी आशंकाएं संभवत: दूर की जा सकती हैं।
 
 
 

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