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संवाद से विश्वास

भास्कर न्यूज | Sep 07, 2012, 02:19AM IST
 
 

संकट के समय इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर वैध प्रतिबंध क्या हो- इस बारे में सरकार का इस माध्यम से जुड़े तमाम पक्षों और समाज के अन्य हिस्सों से संवाद शुरू करना स्वागतयोग्य है। इसे एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया के रूप में स्थापित किया जा रहा है, यह और भी संतोष की बात है।

सरकारी अधिकारियों के साथ अपनी पहली बैठक में सोशल नेटवर्किग साइट्स, इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (आईएसपी), मोबाइल सेवा संचालकों, सिविल सोसायटी, तकनीकी समूहों एवं मीडिया के प्रतिनिधियों ने महत्वपूर्ण सुझाव दिए, जिन्हें सरकार ने सकारात्मक रूप से ग्रहण किया। सहमति बनी कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वाली सामग्रियों के मुकाबले के लिए खुद सरकार इन माध्यमों का उपयोग करे। यानी उसे आश्वस्त करने वाली सूचनाओं का प्रसार कर अफवाहों को नाकाम करना चाहिए।

इंटरनेट कंपनियों, सोशल मीडिया, आईएसपी और दूरसंचार कंपनियों के साथ साझेदारी कर सरकार इसमें सक्षम हो सकती है। इन सुझावों के साथ सरकार आपत्तिजनक सामग्रियों को ब्लॉक करने के मामलों में अधिक पारदर्शिता एवं स्पष्टता बरतने पर भी सहमत हुई। मसलन, ऐसी सामग्रियों को किन हालात में प्रतिबंधित किया जा सकता है, इसका आदेश कौन देगा और क्या ब्लॉक साइट्स के पास अपना पक्ष रखने का कोई माध्यम होगा- इन प्रश्नों पर सरकार सबको भरोसे में लेगी।

असम की घटनाओं के सिलसिले में इंटरनेट और मोबाइल फोन के जरिए जिस तरह अफवाहें फैलाकर भय का माहौल बनाया गया, उसके बाद समाज में इन माध्यमों के दुरुपयोग को लेकर नई समझ बनी है। मगर यह आशंका भी है कि आपत्तिजनक सामग्रियों को रोकने के नाम पर सरकारें कहीं अपने लिए असुविधाजनक सूचनाओं एवं विचारों को सेंसर न करने लगें। इसीलिए मांग उठी है कि कभी रोक लगानी ही पड़े, तो प्रक्रिया सुपरिभाषित होनी चाहिए। अच्छी बात है कि विभिन्न हलकों से उठी आशंकाओं एवं मांगों पर सरकार ने सकारात्मक रुख अपनाया है। संवाद से संदेह टूटता है। दरअसल, पहली बैठक के बाद सभी पक्षों में विश्वास भावना देखी गई है। इस सिलसिले को आगे बढ़ाने की जरूरत है।
 
 
 

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