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झूठ बोलूं तो कौआ काटे

 
Source: खुशवंत सिंह   |   Last Updated 00:10(24/09/11)
 
 
 
 
जब भी अनीस जंग मेरे आत्मसम्मान को चुनौती देना चाहती हैं, तो मुझ पर यह आरोप लगाने लगती हैं कि मैं झूठ बोलता हूं और वे मेरी जगह होतीं तो ऐसा कभी नहीं करतीं। पिछली बार जब उन्होंने इस तरह मेरे आत्मसम्मान को चुनौती दी थी तो वह वास्तव में एक सच्ची घटना को लेकर थी और इसका नाता दलाई लामा से था।

दलाई लामा का एक शिष्य मेरे पास एक लाल धागा लेकर आया था और उसने मुझसे कहा था कि इसे बाएं हाथ की कलाई पर बांधना मेरे लिए ठीक रहेगा। जब मैंने उससे पूछा कि Rठीकञ्ज से उसका क्या आशय है तो उसने जवाब दिया कि यह लाल धागा इस दुनिया से शांतिपूर्ण ढंग से रुखसत होने में मेरी मदद करेगा।

खैर, मैंने उस धागे को अपनी कलाई पर नहीं बांधा और उसे अपनी टेबल की दराज में सम्मान के साथ रख दिया। मैंने तय किया है कि मैं उसे अपनी कलाई पर नहीं बांधूंगा। हालांकि मैं जानता हूं कि अब मैं ज्यादा दिनों का मेहमान नहीं हूं।

मैंने अनीस जंग को भी यह बताया। वे अब दिल्ली में नहीं रहतीं और उनका नया घर वर्सोवा में है। जब मैंने उन्हें इस बारे में बताया तो उन्होंने मेरी इस बात को भी झूठ ही माना। उन्होंने यह भी कहा कि वे दलाई लामा को बहुत अच्छे-से जानती हैं। मैंने उनके आत्मविश्वास को डिगाने का प्रयास किया।

मैंने उनसे कहा: ‘हो सकता है तुम दलाई लामा को जानती हो। शायद तुमने ल्हासा के उसी स्कूल में पढ़ाई भी की है, जिसमें कभी दलाई लामा पढ़े थे।’ उन्होंने मेरे कटाक्ष की अनदेखी कर दी और मेरे आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने के अपने अभियान में जुटी रहीं।

लेकिन अब जब मैं संत्रास के दौर से गुजर रहा हूं और मेरा अंत भी निकट है, मुझे नहीं पता कि वे अब भी खुद को दलाई लामा का परिचित मानती होंगी या नहीं। और यकीनन, जब अखबारों में (और मैं उम्मीद करता हूं शायद कुछ टीवी चैनलों पर भी) मेरी मृत्यु की खबर प्रसारित की जाएगी और मुझे श्रद्धांजलि दी जाएगी, तब मैं वह सब देखने और सुनने के लिए उपस्थित नहीं रहूंगा।

चलो शुरुआत तो हुई:

मुंबई, कोलकाता, दिल्ली
भारत और इंडिया
की हर गली में
उत्साह और उल्लास के साथ
उत्सव मनाते लोग।
दृढ़ता, ईमानदारी और निष्ठा का उत्सव।
एक ऐसे सीधे-सरल आदमी के
संकल्प का उत्सव
जिसमें गांधी की छवि दिखती है हमें
और जो प्रतीक बन गया है
देश के आक्रोश और आशाओं का।
वह हमारे जनतंत्र की एक विलक्षण जीत थी।
ऐसा नहीं है कि भ्रष्ट इसके बाद
बाज आ जाएंगे अपनी हरकतों से
कर लेंगे तौबा।
ऐसा नहीं है कि रातों-रात
मिट जाएगा नामो-निशान
देश से अनैतिक लोगों का।
और ऐसा भी नहीं है कि
पैसे और सत्ता का रौब
यकायक हो जाएगा कम।
लेकिन निराशा के इस घटाटोप में
कुछ तो हुआ: एक चिंगारी ही सही।
कुछ नए विचारों ने तो करवट बदली,
कुछ बर्फ तो पिघली।
यह भरोसा तो जगा
कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध
जंग छेड़ी जा सकती है।
भले ही अभी शुरू ही हुई हो यह लड़ाई
और अभी बहुत कुछ किया जाना शेष हो।
जो भी हो नतीजा इस लड़ाई का
अन्ना ने हमें एक रोशनी तो दिखाई ही है।
(सौजन्य : कुलदीप सलिल, दिल्ली)

पिता का सबक: एक शराब कंपनी का मालिक अपने सत्रह वर्षीय बेटे को सिखा रहा था कि महिलाओं के साथ किस तरह शिष्टाचार के साथ पेश आते हैं, कैसे उनके सामने डांस का प्रस्ताव रखा जाता है, कैसे उन्हें डिनर पर निमंत्रित किया जाता है, कैसे उनसे अपने दिल की बात कही जाती है और कैसे उनका दिल जीता जाता है। पिता से सीख लेकर लड़का गया और एक घंटे बाद लौट आया। पिता ने उससे पूछा कि बेटा तुम उदास क्यों नजर आ रहे हो? बेटे ने जवाब दिया: ‘आपने यह तो सिखा दिया कि लड़कियों का दिल कैसे जीता जाता है, लेकिन अब यह भी सिखा दीजिए कि उनसे पीछा कैसे छुड़ाया जाए!’
(सौजन्य : अनिर्बान सेन, दिल्ली)

गड़बड़ी का कारण: दो जुड़वां भाइयों का दाखिला अलग-अलग स्कूलों में कराया गया था। जब मैंने उनमें से एक से इसका कारण पूछा तो उसने जवाब दिया: ‘जब हम साथ-साथ पढ़ते थे तो मेरा भाई हमेशा कुछ न कुछ गड़बड़ कर दिया करता था। अब सबको पता चल गया है कि वास्तव में गड़बड़ वो नहीं, मैं करता था!’
(सौजन्य : रीतेन गांगुली, तेजपुर)
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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