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लोकायुक्त पर बुरे फंसे

 
Source: वेदप्रताप वैदिक   |   Last Updated 00:04(07/09/11)
 
 
 
 
इधर रामलीला मैदान में अन्ना हजारे का अनशन अंतिम दौर में था, उधर कांग्रेस पार्टी ने गुजरात में नहले पर दहला मारने की कोशिश की। उसने वहां नए लोकायुक्त की नियुक्ति करवा दी।

अन्ना हजारे को उसने संदेश दिया कि तुम तो सिर्फ बात करते हो, लोकपाल और लोकायुक्त की! लो, हमने तो लोकायुक्त नियुक्तकरके दिखा दिया। एक वार से दो शिकार! भाजपा को भी मजा चखाया। भाजपा के लौहपुरुष नरेंद्र मोदी को हमने शिकंजे में कस दिया। अब देखना कि गुजरात भी कर्नाटक बनता है या नहीं!

गुजरात को कर्नाटक बनाने का यह नाटक अब उल्टे कांग्रेस के गले पड़ गया है। संसद का कामकाज तो ठप्प हो ही गया है, कांग्रेस के अंदर भी बहस छिड़ गई है। कांग्रेसी नेता एक-दूसरे से पूछ रहे हैं कि बर्र के छत्ते में हाथ डालने का यह निर्णय आखिर किसने लिया है।

कांग्रेस में कोई राजनीतिक बुद्धि बची भी है या नहीं? सोनियाजी अपना इलाज कराने विदेश क्या गईं, पूरी कांग्रेस की ही सेहत चिंतनीय हो गई है। अन्ना और रामदेव पर हाथ डालकर कांग्रेस पहले ही इतनी कमजोर हो गई है कि इस नाजुक दशा में उसे यह नया सिरदर्द मोल लेने की जरूरत क्या थी? यदि राज्यपाल कमला बेनीवाल की इस कार्रवाई को तकनीकी तौर पर सही मान लिया जाए तो भी उसके लिए क्या यही सही मौका था? यह मौका तो और भी बुरा सिद्ध हो रहा है।

कमला बेनीवाल की इस कार्रवाई को टीम अन्ना और बाबा रामदेव के विरुद्ध की जा रही बदले की कार्रवाइयों से जोड़कर देखा जा रहा है। जैसे कांग्रेस अन्ना और रामदेव का मुकाबला राजनीतिक ढंग से नहीं कर पाई, वैसे ही वह अब तक नरेंद्र मोदी को किसी भी जाल में नहीं फंसा पाई।

यदि गुजरात में लोकायुक्तकी नियुक्ति इन आंदोलनों के पहले या बाद में होती तो आम लोग सारे मुद्दे पर शायद जरा तटस्थतापूर्वक विचार करते। लेकिन अब जस्टिस आरए महेता को लोकायुक्त बनाने के विरोध में तो सभी विपक्षी दल एकजुट हो गए हैं, राज्यपाल की वापसी की मांग भी जोर पकड़ने लगी है।

राज्यपाल का पद पहले ही काफी विवादास्पद हो चुका है। लोकायुक्त के इस विवाद ने राज्यपाल के पद की गरिमा पर नए प्रश्नचिह्न् लगा दिए हैं। अन्ना के आंदोलन के दौरान इस मुद्दे पर जमकर बहस चली है कि लोकपाल या लोकायुक्तकी नियुक्ति कैसे होनी चाहिए? उसके नियोक्ता कौन-कौन होने चाहिए।

यह मामला इतना गंभीर और पेचीदा है कि इस पर टीम अन्ना और मंत्री टीम दोनों ने अपनी-अपनी राय में कई फेरबदल किए हैं। सबकी मंशा यही है कि जो भी लोकपाल या लोकायुक्त नियुक्त हो, वह प्रामाणिक, निष्पक्ष, निर्भय और सर्वस्वीकार्य व्यक्तिहो। कमला बेनीवाल के निर्णय ने क्या इन मापदंडों का ध्यान रखा है?

दूसरे शब्दों में, उन्होंने अपने इस अकस्मात निर्णय से उस लोक-लहर की अनदेखी कर दी, जिसने इस सरकार की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ा दी थी। कमलाजी कोई भूतपूर्व सरकारी अफसर या सेवानिवृत्त फौजी अफसर नहीं हैं। उनका राजनीतिक जीवन काफी लंबा रहा है।

यदि वे जनभावना को नहीं समझ सकतीं तो फिर कौन समझ सकता है? लेकिन अक्सर राज्यपालों को केंद्र के इशारों पर ही काम करना होता है। केंद्र ने पहले रामदेव और अन्ना के मामलों मंे अपने कुछ उदीयमान नेताओं की बलि चढ़ा दी और अब उसने राज्यपाल पद की इज्जत भी दांव पर लगा दी है।

गुजरात के लोकायुक्तकानून की मूल धारा को पढ़ें तो उसमें यही लिखा है कि राज्यपाल को चाहिए कि लोकायुक्त की नियुक्तिकरने के पहले वह राज्य के मुख्य न्यायाधीश से सलाह ले। गुजरात मंे लोकायुक्त का पद आठ साल से खाली पड़ा था।

राज्यपाल कमलाजी ने मुख्य न्यायाधीश से सलाह की और पटाक से आरए महेता की नियुक्ति कर दी। उनके हिसाब से उन्होंने कानून का पेट भर दिया, लेकिन क्या कोई भी राज्यपाल या राष्ट्रपति अपने मंत्रिमंडल की सलाह के बिना ऐसी नियुक्ति कर सकता है? बिल्कुल नहीं कर सकता।

यह भारतीय संविधान और भारतीय संसदीय परंपरा का सरासर उल्लंघन है। यह इसी से सिद्ध होता है कि इसी गुजरात में स्वयं कमलाजी इसी मुख्यमंत्री से लोकायुक्त के बारे में कई बार नामांकन मांग चुकी हैं। गुजरात के लोकायुक्तकानून में प्रतिपक्ष के नेता से भी परामर्श करने का प्रावधान है।

क्या यह संभव है कि किसी राज्य का राज्यपाल किसी बड़ी नियुक्ति के लिए प्रतिपक्ष के नेता से तो सलाह ले, लेकिन सत्ता पक्ष के नेता की उपेक्षा कर दे? सत्ता पक्ष की सहमति के बिना राज्यपाल पत्ता भी नहीं हिला सकता, यह सर्वमान्य तथ्य है, लेकिन कमला बेनीवाल ने राज्यपालों की अब तक की सारी परंपराओं को तोड़कर अपने नाम से वारंट जारी करके लोकायुक्त की नियुक्ति कर दी। जाहिर है कि ऐसा दुस्साहस केंद्र सरकार के इशारे के बिना नहीं हो सकता।

यह ठीक है कि राज्य का इतना महत्वपूर्ण पद सात-आठ साल से खाली पड़ा हो तो राज्यपाल को कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा, लेकिन जिस तरह से गुजरात में यह नियुक्ति हुई है, उसके कारण पहले ग्रास में ही मक्खी पड़ गई। जस्टिस महेता मोदी सरकार के विरोधी के तौर पर पहले से ही जाने जाते हैं।

अब तो उनकी खुली आलोचना हो रही है। इस लोकायुक्त ने यदि कोई सही जांच की और सही निर्णय किया तो भी लोग उस पर भरोसा नहीं करेंगे। न महेता हेगड़े बन पाएंगे और न ही मोदी येदियुरप्पा! कांग्रेस का लक्ष्यभंग तो अभी से हो चुका।

यह अच्छा हुआ कि कर्नाटक में राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच जैसी थुक्का-फजीती हुई थी, वैसी गुजरात में नहीं हो रही है। नरेंद्र मोदी ने शिक्षक दिवस पर उपस्थित राज्यपाल महोदया को ‘मातृतुल्य’ कहकर और अदालत के केस में से भी उनका नाम हटाकर विशेष गरिमा का परिचय दिया है।

इसी तरह का गरिमामय संकेत केंद्र और राज्यपाल की तरफ से भी आना चाहिए, ताकि इस गरिमाहीन विवाद का पटापेक्ष हो। इस तरह के शुद्ध राजनीतिक मामलों का निपटारा भी यदि अदालतें करती रहीं तो हमारे राजनेताओं की बची-खुची साख को भी बट्टा लगे बिना नहीं रहेगा।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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