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मेरी तन्हाइयों का एक पुराना साथी

रस्किन बॉन्ड | Dec 01, 2012, 01:14AM IST
 
 

बचपन से जुड़ी कई ऐसी चीजें हैं, जिन्हें मैं आज तक नहीं भूल पाया हूं। मेरा ग्रामोफोन भी इन्हीं में से एक था। यह एक बड़ा-सा चौकोर बक्सा था, जिस पर बेहतरीन पॉलिश की गई थी। इसमें एक हैंडल लगा था, जिसे आपको घुमाना पड़ता था और इसमें एक खूबसूरत चोंगा भी लगा था। हमें इसके रिकॉर्ड के साथ-साथ स्टील की नीडल भी बदलनी पड़ती थी।
 
ग्रामोफोन के रिकॉर्डस को गत्ते के बॉक्स में सीधे जमाया जाता था, ताकि यह कहीं से मुड़ न जाए। यदि उन्हें सीधा पैक न किया जाता तो वातावरण की गर्मी और नमी उन्हें ऐसे अजीबोगरीब आकार में बदल देती, जिसके बाद आप उन्हें आधुनिक शिल्प की किसी प्रदर्शनी में रख सकते थे। मुझे इसका हैंडल घुमाने, रिकॉर्ड व नीडल बदलने और रिकॉर्ड का चयन इत्यादि करने में खूब मजा आता था।
 
मैं इन कामों को बेहद व्यवस्थित ढंग से अंजाम देता और इस बात का खास ख्याल रखता कि रिकॉर्डस पर एक भी खरोंच न आने पाए। रिकॉर्डस पर खरोंचों से मुझे नफरत थी। इसके अलावा बजते-बजते बीच में रिकॉर्ड अटकने या उसमें अजीब तरह के सुर निकलने से भी मेरा मूड बिगड़ जाता था। ऐसा अक्सर तब होता, जब हैंडल घुमाते हुए इसकी चाबी पूरी तरह न भरी गई हो। मुझे खासकर नेल्सन एडी की आवाज से सजे ‘द माउंटीज’ और ‘द हिल्स ऑफ होम’ जैसे रिकॉर्डस सुनना बहुत अच्छा लगता था। 
 
यह संगीतमय गतिविधि (जिसमें सुनने वाले को काफी शारीरिक श्रम भी करना पड़ता था) हमारे जामनगर स्थित घर में अक्सर चलती रहती थी। जामनगर उस वक्त एक रियासत हुआ करती थी और मेरे पिताजी इस रियासत के राजकुमार-राजकुमारियों को अंग्रेजी पढ़ाया करते थे। ग्रामोफोन मुख्यत: मेरी मां और मेरे मनोरंजन के लिए लाया गया था, लेकिन मेरी मां इसे चलाने के लिए इतनी मेहनत नहीं कर सकती थीं, लिहाजा यह मेरे काम ही ज्यादा आता। 
 
मुझे ग्रामोफोन से जुड़ी हर बात अच्छी लगती। मैं इसके रिकॉर्डस को भी मुलायम कपड़े से संभल-संभलकर साफ करता। मुझे अपने रिकॉर्ड कलेक्शन की सूची तैयार करने का भी बेहद चाव था। इसे आप मेरे लेखन के कुछ शुरुआती कामों में से एक कह सकते हैं। मेरे पिताजी को कारुसो, गिगली और गैलिकुर्सि का ‘ग्रांड ऑपेरा’ सुनना काफी अच्छा लगता था।
 
वहीं मुझे नेल्सन एडी, डिएना डर्बिन, ग्रेसी फील्ड्स, रिचर्ड टॉबर और ‘द स्ट्रीट सिंगर’ (आर्थर ट्रेसी) के हल्के-फुल्के गाने पसंद थे। अरब सागर के तट पर बैठकर नेल्सन को मिसौरी नदी के बारे में खूबसूरती से गाते हुए सुनना आपको भले ही अजीब लगे, लेकिन मेरे लिए यह स्वाभाविक बात थी। मैं इसी तरह का संगीत सुनते हुए बड़ा हुआ। और मुझे यह सब सुनना आज भी अच्छा लगता है। 
 
मैं एक तन्हा बालक था, जिसका कोई हमउम्र दोस्त नहीं था। इसलिए यह ग्रामोफोन और रिकॉर्ड कलेक्शन मेरे लिए बहुत मायने रखता था। जब हम जामनगर छोड़कर देहरादून के लिए निकले तो हमारी तीन दिन तीन रात लंबी ट्रेन यात्रा में यह ग्रामोफोन भी हमारा साथी रहा। यहां हिमालय की तराई में स्थित हमारे दादू के घर के विशाल परिसर में ‘द हिल्स ऑफ होम’ और ‘शेननदोह’ जैसे गाने पराए नहीं लगते थे।
 
दादू के पास भी एक ग्रामोफोन था। हालांकि वह हमारे ग्रामोफोन जितना बड़ा नहीं था। उनका अपना रिकॉर्ड कलेक्शन भी था। उनका टेस्ट मुझसे कहीं ज्यादा ‘मॉडर्न’ था। डांस म्यूजिक के तो वह दीवाने थे और उनके पास फॉक्स-ट्रॉट, टैंगो इत्यादि पश्चिमी शैली के नृत्यों के रिकॉर्डस का काफी संकलन था। दादी को वाल्ट्ज नृत्य बहुत अच्छा लगता था और उन्होंने मुझे भी इसकी धुन पर थिरकना सिखाया। मैं ‘द ब्लू डेन्यूब’ और  ‘द स्केटर्स वाल्ट्ज’ की धुनों पर उनके साथ बरामदे में वाल्ट्ज नृत्य करता रहा। जल्द ही मैं इस नृत्य को अच्छी तरह करना सीख गया। तभी मैंने एक तड़क-भड़क से भरपूर एमजीएम म्यूजिकल में जीन केली को टैप-डांसिंग करते हुए देखा। फिर क्या था! मैं वाल्ट्ज को भूल पूरे घर में टैप-डांसिंग करता घूमता रहता। मेरे इस बदलाव से दादी का निराश होना स्वाभाविक था। 
 
कुछ समय बाद मुझे बोर्डिग स्कूल भेज दिया गया और जिसके चलते मुझे नौ महीने तक अपने घर से दूर रहना पड़ा। इस दौरान मैंने अपने इस प्यारे  ग्रामोफोन को बहुत मिस किया। बोर्डिग स्कूल में मैं गर्मी की छुट्टियों का बेसब्री से इंतजार करता रहता। छुट्टियों में घर पहुंचने पर कुछ नए रिकॉर्डस मेरा इंतजार कर रहे थे। मेरे दादू तो ब्राजीलियाई रुंबा के दीवाने हो चुके थे, जिसका जादू उन दिनों लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा था। मेरे दादू रुंबा करते बहुत अच्छा थे। 
 
मुझे लगता था कि दादू इसके बाद सांबा और कैलिप्सो जैसे नृत्यों पर भी हाथ आजमाएंगे, लेकिन तभी मुझे भारत छोड़ना पड़ा। मैं पांच साल तक भारत से दूर रहा और इस दौरान मेरी गैरमौजूदगी में वहां काफी कुछ बदल गया। मेरे दादा-दादी गुजर गए और मेरी मां पुराने ग्रामोफोन को बेचकर उसकी जगह एक बड़ा-सा रेडियोग्राम ले आई थीं। मगर मुझे इसमें ज्यादा मजा नहीं आता। आखिर मैं कोई ऐसी चीज चाहता था, जिसमें मैं चाबी भर सकूं।
 
मुझे आज भी लगता है कि मेरा प्यारा ग्रामोफोन मुझे कहीं मिल जाएगा- किसी एंटीक शॉप में, किसी के अटाले या भंडारकक्ष में, या कहीं पुराने सामान की बिक्री में। इसके बाद मैं इसे किसी भी कीमत पर वापस खरीद लूंगा और लाकर अपने स्टडी रूम में रखूंगा। फिर मैं इसमें चाबी भरते हुए पुराने रिकॉर्डस सुनने का आराम से लुत्फ लूंगा। इसी उम्मीद में मैंने नीडल का एक बॉक्स अभी भी अपने पास संभालकर रखा है। 
 
रस्किन बॉन्ड
 
पद्मश्री से सम्मानित ब्रिटिश मूल के साहित्यकार 

 

 

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