जब तक जीवन है तब तक मनोरंजन है
वरुण के सखाजी | Aug 14, 2012, 06:26AM IST

दोस्ती करो तो टीवी देख पाओ। मृगनयनी, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, हम लोग, भीम-भवानी और सबसे ज्यादा जरूरी महाभारत। खेतों में चरने वाले जानवर, खरपतवार, कीड़े-मकोड़े सब जान जाते थे कि आज संडे है। दूर तलक न खेतिहर मजदूर, न मालिक। वजह : सुबह महाभारत, शाम को हिंदी फीचर फिल्म। बीच में कुछ खाना-पीना और जरूरी काम।
बहरहाल, मनोरंजन के सीमित साधनों पर ही निर्भर रहना था। और तिसपर तरह-तरह के बंधन भी थे। यह सलाह बारहों महीने हिट थी कि टीवी नहीं देखना चाहिए। आंखें तो खराब होती ही हैं, साथ में पढ़ाई भी। समस्या यह थी कि बुजुर्गो को हर हाल में बच्चों को टीवी देखने से रोकना था और बच्चों, महिलाओं व नौजवानों की जिद थी कि टीवी तो हर हाल में देखना है। तो मामला विरोध, सहमति, असहमति, वार्ता, संवाद और चोरी-चोरी चुपके-चुपके स्टाइल में सुलझ भी जाता। मगर समस्या तब विकराल हो जाती, जब कोई स्वर्ग सिधार जाता। यह संवेदनशील मामला होता था। टीवीबंदी का विरोध करें तो बिना मनोरंजन सूना जीवन और चुपचाप देखें तो मन की नैतिकता खा जाए।
मगर मनोरंजन तो मनोरंजन है! क्या करें, यह भी खाने-पीने या अन्य दैनिक कार्यो की तरह ही जरूरी है। लेकिन ऐसा जरूरी, जिसकी संतुलित खुराक को लेकर कहीं गंभीर चर्चा नहीं होती। मनोरंजन की कमी या अधिकता का असर रोटी की तरह पेट या पूरे शरीर पर नहीं दिखता। यह मनुष्य के मानस, आचरण, बर्ताव में नजर आता है। मनोरंजन का मीटर डाउन हुआ तो खराब, ऊपर हुआ तो खराब। संतुलित होना जरूरी है। और इंसान की पहचान पेट तो है नहीं, सोचने-समझने की शक्ति ही उसकी असल पहचान है। तब मनोरंजन एक तरह से रोटी से भी ज्यादा जरूरी हुआ। हास्य का बोध, रुदन का एहसास, यह सब मनोरंजन-माध्यम से ही तो आएगा न!
मगर क्या करें, टीवी बंद करने का आदेश हुआ और सक्रिय कार्यकर्ताओं ने बिना वक्त गंवाए उसके निचले हिस्से में लगे तीन बटनों में से कोने वाला चट से बंद कर दिया। इस काम में अक्सर वे नैतिकता के स्वयंभू पहरेदारों की तरह आगे रहते थे। खुद भी टीवी देखना चाहते थे, किंतु बड़ों की नजरों में अपनी इमेज चमकाने के लिए टीवी बंद करने को भी तत्पर रहते। खैर! लोग भी मानो मरने के लिए तब तक बैठे रहते थे, जब तक कि कोई अच्छा-सा कार्यक्रम न आने वाला हो।
एक परदादी अम्मा 90 से ऊपर की थीं। एक कोने में पड़ी रहतीं। न हाथ-पैर चलते थे, न दिमाग। बीसों बरस से तो वह और बूढ़ी होना तक बंद कर चुकी थीं। झुर्रियों भरा पोपला मुंह जस का तस। मगर चूंकि इंसानी बिरादरी की पहचान हैं संवेदनाएं, तो परदादी मरे या नौजवान बेटा, अपने आप मरे या दुर्घटना में- असर सीधा टीवी पर ही पड़ता। एक दिन फिल्म पूरे शबाब पर थी। मनोरंजन अपार हो रहा था। मगर सुख कहां लंबे टिकते हैं! डर था बिजली न चली जाए, कोई महान टाइप की शख्सियत न गुजर जाए। और सबसे बड़ा डर तो था परदादी का।
..और तभी दो कार्यकर्ता टीवी वाले कमरे में दाखिल हुए और उसका बटन पकड़कर मरोड़ दिया। सभी सन्न! इससे पहले कि कोई कुछ कह पाता, सूचना दी गई : परदादी चल बसीं। अंदेशा सच हो गया। लेकिन उन बेचारी का क्या दोष, वह न मरतीं तो देश में कोई और मरता। मनोरंजन से महरूम हमारे चेहरों पर मातम पसर गया। हालांकि एक-दूसरे के चेहरे ताकते सभी सोच रहे थे कि परदादी के स्वर्गवास के गम में चेहरे लटके हैं।






