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महात्मा के उपदेश ने किया चोरों का हृदय परिवर्तन

Bhaskar News | Jul 21, 2012, 01:58AM IST
 
 

किसी नगर में दो चोर रहते थे। वे प्रतिदिन चोरी करते और चोरी का माल दो हिस्सों में बांट देते थे। एक हिस्स स्वयं का और दूसरा भगवान को चढ़ा देते थे। एक रात जब वे चोरी के लिए निकले, तो खूब भटकने के बाद भी चोरी करने का कोई मौका नहीं मिला।

दोनों थककर एक मंदिर के चबूतरे पर बैठ गए। वहां उनकी भेंट एक संत से हुई। संत ने उनसे परिचय पूछा तो उन्होंने स्वयं के विषय में सच-सच बता दिया। यह सुनकर महात्मा बोले - ‘तुम जो करते हो, वह उचित है या अनुचित, इस पर तुमने कभी विचार किया है?’ चोर बोले - ‘हम जो करते हैं, वह उचित ही होगा, क्योंकि चोरी करके हम जो भी धन या वस्तु प्राप्त करते हैं, उसे दो भागों में बांट देते हैं।

एक भाग हम स्वयं रखते हैं और दूसरा भगवान को अर्पित कर देते हैं।’ तब महात्मा ने अपने झोले में से एक जीवित मुर्गा निकाला और उन्हें देते हुए कहा - ‘आज तुम चोरी न कर पाए। इस कारण निराश लग रहे हो। यह मुर्गा रखो। इसके दो हिस्से कर लेना। एक खुद रख लेना और दूसरा भगवान के चरणों में चढ़ा देना।’ दोनों चोर सकपका गए। फिर महात्मा का आशय समझकर बोले - ‘महात्माजी! आपने हमारी आंखें खोल दीं।

हम पाप की कमाई भगवान को चढ़ाकर महापाप कर रहे थे। अब हम चोरी न करते हुए मेहनत की कमाई खाएंगे और उसका एक हिस्सा ईश्वर को अर्पित करेंगे।’ सार यह है कि पाप की कमाई संपन्नता देने के बावजूद असंतोष और व्यग्रता का कारण बनती है, जबकि मेहनत की कमाई सदैव आत्मा को सुकून देती है।
 
 
 

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