परमात्मा को बनाएं अपना पार्टनर
पं. विजयशंकर मेहता
| Dec 22, 2012, 00:45AM IST
कुछ काम अकेले हो ही नहीं सकते। सहयोगी की जरूरत पड़ती ही है। सहयोग जब महत्वपूर्ण हो जाए तो पार्टनरशिप शुरू हो जाती है। लोग व्यवसाय में भागीदारी इसलिए करते हैं कि योग्यता, परिश्रम व धन का बंटवारा एक-दूसरे को लाभ पहुंचा सके।
यह सारा मामला विश्वास पर टिका होता है। संदेह को संयम में रहकर भरोसे का आवरण ओढ़कर फायदे-नुकसान की मजबूरी से कई लोग जिंदगीभर पार्टनरशिप में धंधा कर जाते हैं। परिवारों में रिश्ते प्रेम में भले ही न बदलें, पर पार्टनरशिप में जरूर तब्दील होते देखे गए। जिंदगी के मामले में सबसे महत्वपूर्ण है लाइफ पार्टनर।
जीवनसाथी का चयन भले ही सौदे की तरह शुरू हो, लेकिन सौदे के साथ इसे जीवन भर चला नहीं सकते। यह पार्टनरशिप एक-दूसरे के आंतरिक सौंदर्य व विशिष्ट गुणों के साथ जीने पर टिकी है। लेकिन यहां भी संदेह और अहंकार होने के कारण यह रिश्ता भी अपनी विश्वसनीयता खो रहा है। जीवन में पार्टनरशिप करनी ही पड़ती है। इसलिए एक पार्टनरशिप ऐसी की जाए, जहां संदेह, विश्वासघात का मौका ही न रहे। यदि गड़बड़ की संभावना रहे तो हमारी ही ओर से होगी, सामने वाले की ओर से सदैव विश्वास, कृपा ही मिलेगी। यह पार्टनरशिप रहेगी हमारे और परमात्मा के बीच। भगवान को अपना पार्टनर बनाना चाहिए, जीवन के हर क्षेत्र में इनकी भागीदारी फायदे और भरोसेमंद ही रहेगी।
परमात्मा हमारा पार्टनर बनकर बाहर के अंधकार से हमें बचाएगा तथा भीतर के दीये की लौ को भी नहीं बुझने देगा। हमारी सेवा के हिस्से से ज्यादा उसकी नियामत और रहमत की हिस्सेदारी होगी। एक बार ऐसा भी आजमाकर देख लें।






