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जन-आंदोलनों का भविष्य

dainik bhaskar news | Aug 22, 2012, 00:09AM IST
 
 

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने पहले स्वाधीनता दिवस संदेश में यह चिंता व्यक्त की कि लगातार चलने वाले जन-आंदोलन हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमला कर रहे हैं। यह कहते वक्त संभवत: वह भूल गए कि यदि जन-आंदोलन नहीं होता तो यह स्वाधीनता ही नहीं होती, लोकतंत्र भी नहीं होता और वे संस्थाएं भी नहीं होतीं, जिनके नष्ट होने की चिंता वह प्रकट कर रहे हैं। क्या उन्हें ‘लगातार’ चलने वाले जन-आंदोलनों से आपत्ति है? आश्चर्य है कि ‘लगातार’ चलने वाले भ्रष्टाचार से उन्हें ऐसी आपत्ति नहीं है।



यूपीए सरकार का यह भ्रष्टाचार सिर्फ ‘लगातार’ ही नहीं है, बल्कि अपरंपार है। इतना भ्रष्टाचार भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। इस भ्रष्टाचार को देखकर तो हमारे पुराने अंग्रेज मालिक भी शरमा जाएं। क्या यह भ्रष्टाचार हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को नष्ट नहीं कर रहा? आज हमारे प्रधानमंत्री, मंत्रियों, राजनीतिक दलों और यहां तक कि संसद की प्रतिष्ठा पर भी प्रश्नचिन्ह लग गया है। अभी जो दो जन-आंदोलन चले, एक अन्ना हजारे का और दूसरा बाबा रामदेव का, वे तो सिर्फ डेढ़-दो साल से ही चले हैं और ‘लगातार’ भी नहीं चले हैं। सिर्फ चार-पांच बार अनशन और सभाएं हुई हैं। कोई भी अनशन तेरह दिन से ज्यादा नहीं चला। इनमें कौन-सी ‘निरंतरता’ रही है? इन्हें सही अर्थो में आंदोलन भी नहीं कहा जा सकता, जैसे कि गांधीजी या लोहियाजी के आंदोलन हुआ करते थे।



क्या भीड़ का इकट्ठा होना ही आंदोलन है? यह बात दूसरी है कि इस अहिंसक और शांतिपूर्ण भीड़ से ही इस हारी-थकी सरकार के छक्के छूट गए। अन्ना और रामदेव के आह्वान पर जो भीड़ जुटी, उसने न तो कोई धरना दिया, न संसद का घेराव किया, न नामपट्ट पोते, न किन्हीं चीजों की होली जलाई, न मंत्रियों के मुंह काले किए और न ही सरकारी काम-काज को ठप्प किया। यदि सचमुच का आंदोलन हो गया होता या अब हो जाए तो पता नहीं, यह घबराई हुई सरकार क्या करेगी? या तो भाग खड़ी होगी या आतताई की तरह जनता पर टूट पड़ेगी।



देश के राजनीतिज्ञों के लिए यह चिंता का विषय है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? इसका कारण क्या है? इसका मुख्य कारण यह है कि इस समय देश के सत्तारूढ़ दल और सरकार के सिर पर वे लोग बैठे हैं, जो राजनीतिक हैं ही नहीं। उन्होंने कभी राजनीति की ही नहीं। वे आंदोलन की महत्ता और शक्ति क्या जानें? वे जिन पदों पर अभी विराजमान हैं, उन्होंने वे अपने राजनीतिक कौशल से अर्जित नहीं किए हैं, बल्कि उन्हें वे किन्हीं अन्य कारणों से मिले हैं। इसीलिए कोई भी जन-आंदोलन उन्हें उद्दंडता ही मालूम पड़ता है। इसमें उनका दोष क्या है? वे अपनी परिस्थिति से मजबूर हैं।



जन-आंदोलनों के प्रति उनकी प्रतिक्रिया अपने आप में अलोकतांत्रिक है। वह राजशाही है। क्या कोई राजा किसी जन-आंदोलन का नेतृत्व करते हुए राजा बनता है? वास्तव में जन-आंदोलन तो किसी भी शासन को अधिकाधिक लोकतांत्रिक बनाने में सहायता करते हैं। यदि लोग अपनी मांगों को लेकर समय-समय पर आंदोलन न करें और पांच साल में एक बार वोट डालकर सो जाएं तो अपनी सरकारों को निकम्मी और भ्रष्ट बनाने का इससे बढ़िया कोई और उपाय नहीं हो सकता। लोहिया ने क्या खूब कहा था, ‘जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं।’



यदि मौजूदा सरकार और सत्तारूढ़ दल के नेतृत्व को जरा भी राजनीतिक समझ होती तो वह इन दोनों आंदोलनों की अग्नि को बिजली में बदल लेता। वह अग्नि गर्मी की बजाय प्रकाश पैदा करती। जनलोकपाल और काले धन की वापसी इस डूबते जहाज के लंगर बन जाते, लेकिन अराजनीतिक नेतृत्व दीवार घड़ी के लोलक की तरह कभी एक सिरे पर टकराता है तो कभी दूसरे सिरे पर। कभी रामदेव के स्वागत के लिए चार-चार मंत्री हवाई अड्डे पर पहुंच जाते हैं और कभी उन पर डंडे बरसाने में भी उन्हें कोई शर्म नहीं आती। कभी अन्ना से बात के लिए मंत्रिगण बेताब हो जाते हैं और कभी उनसे बात करने के नाम पर उन्हें सांप सूंघ जाता है।



इस सरकार और सत्तारूढ़ दल की दूसरी और तीसरी पंक्तियों में अनुभवी और दूरदृष्टि-संपन्न अनेक प्रौढ़ नेतागण हैं, जो बातचीत के जरिए मध्यम मार्ग निकाल सकते थे, लेकिन अपने किंकर्तव्यविमूढ़ और हक्के-बक्के नेतृत्व के आगे वे मौन हैं। रामदेव के रचनात्मक संकेतों का असर उन पर हो रहा था, लेकिन नेतृत्व की जड़ता के कारण यह अप्रतिम अवसर उन्होंने खो दिया। खोया ही नहीं, बल्कि यह संदेश सारे देश में पहुंचा दिया कि ये अनशन वगैरह बिल्कुल निर्थक हैं। आंदोलनकारियों ने भी समझ लिया कि भैंस के आगे बीन बजाना बेकार है। एक अर्थ में अब सरकार ने वास्तविक जन-आंदोलन यानी ‘सीधी कार्रवाई’ का मार्ग खोल दिया है।




यह दुखद है कि अन्ना का आंदोलन इतिहास की अंधेरी सुरंग में खो गया है, लेकिन रामदेव का आंदोलन अपनी राख में से खम ठोककर फिर खड़ा हो गया है। इसे सरकारी विभागों की रिपोर्टो, छापों और आरोपों से दबाया नहीं जा सकता। ये हथकंडे जितने ज्यादा अपनाए जाएंगे, सरकार की प्रतिष्ठा उसी अनुपात में गिरती चली जाएगी। और अब तो सरकार ने अपनी जड़ता के चलते सारे विरोधी दलों को मौका दे दिया है कि वे बगावत के रामदेववाहन पर सवार हो जाएं। अब यह रामदेव पर निर्भर है कि वह अपने भ्रष्टाचार-विरोधी युद्ध को कुछ इस तरह चलाएं कि वह सिर्फ कांग्रेस-विरोध पर सिमटकर न रह जाए, बल्कि उसमें हर उस पार्टी, नेता और व्यक्ति का स्वागत हो, जो भ्रष्टाचार का विरोध करता हो।



उन श्रेष्ठ कांग्रेसियों का भी स्वागत हो जो भ्रष्टाचार-विरोधी हैं और उन लोगों का भी, जो भ्रष्टाचार का त्याग कर सदाचार के मार्ग पर चलने के लिए संकल्पबद्ध हों, जैसे हत्यारा अंगुलिमाल और वैशाली की नगरवधू आम्रपाली बुद्ध की शरण में आए थे। एक संन्यासी के नेतृत्व में चलने वाला आंदोलन सर्वसमावेशी और सर्वहितकारी होना चाहिए। वह सिर्फ सरकार को ही नहीं ललकारे, बल्कि आम जनता को भी जगाए, जिसके मौन के बिना सरकारी कर्मचारी व राजनेता भ्रष्टाचार कर ही नहीं सकते। जिस दिन देश की जनता भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध सीधी कार्रवाई पर उतारू हो जाएगी, यह दुनिया का सबसे अधिक सुशासित और संपन्न राष्ट्र बन जाएगा।
 
 
 

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