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ज्ञान के इस दौर में विज्ञान का ठौर कहां?

 
Source: ए जयजीत   |   Last Updated 00:25(10/02/12)
 
 
 
 
हाल ही में अपने शहर के एक नामी स्कूल में विज्ञान मॉडल प्रदर्शनी देखने का मौका मिला। उसे देखकर पच्चीस साल पहले की विज्ञान प्रदर्शनियां आंखों में तैर गईं। दोनों में क्या कुछ अंतर था? अफसोस, कुछ भी नहीं। जो विज्ञान मॉडल उस समय प्रदर्शित किए जाते थे, वैसे ही कमोबेश इस प्रदर्शनी में पेश किए गए थे।


कोई इनोवेशन नहीं, कोई नया चमत्कार नहीं। इन पच्चीस सालों में बहुत कुछ बदला है। टाइपराइटर के स्थान पर लैपटॉप व आईपैड आ गए हैं, वॉकमैन के स्थान पर आईपॉड, डॉयल वाले फोन के स्थान पर स्मार्ट आईफोन। आज पांच साल का बच्चा मोबाइल ऑपरेट कर लेता है, सात साल का बच्चा इंटरनेट सर्फिग में माहिर है।


इन तेज-तर्रार बच्चों पर उनके अभिभावक गर्व भी करते हैं। कोई बुराई नहीं। लेकिन मोबाइल और कंप्यूटरों की इस तेजी से बदलती दुनिया के बीच सबसे बड़ा सवाल : बुनियादी विज्ञान में हम कहां हैं? क्या बच्चों की यह विज्ञान मॉडल प्रदर्शनी इस ओर इशारा नहीं करती कि बुनियादी विज्ञान में हम और भी हाशिये पर खिसक आए हैं?


क्या आज हमारे लिए विज्ञान के मायने बदल गए हैं? अब हमें सापेक्षता का सिद्धांत और गति के नियम चमत्कृत नहीं करते। विज्ञान के आज दो ही मतलब हैं। एक, आईआईटी व समकक्ष तकनीकी संस्थानों में सीटों को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा। दूसरा, सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) व उनसे संबंधित मल्टीनेशनल कंपनियां। हमारे देश में इनका संबंध विज्ञान से कम, कॅरियर से ज्यादा है। ऐसे में जब आईआईटी के एक सीनियर प्रोफेसर कहते हैं कि उनके अधिकांश विद्यार्थियों में विज्ञान की बुनियादी समझ तक नहीं होती, तो उस पर कोई अचरज नहीं होता। आखिर कोचिंग क्लासेस में गढ़े गए इन बच्चों के दिमाग में फॉमरूले ही तो होंगे, इनोवेशन के आइडिये नहीं!


आईटी ने बहुत कुछ दिया है। यह देश को मिलने वाली विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत है। इसने हजारों मध्यमवर्गीय परिवारों के सपनों को साकार किया है। दिक्कत यह है कि हमारे देश की चेतना में आईटी इस कदर घुल-मिल गई है कि हमने इसे ही सब कुछ मान लिया है। हम स्टीव जॉब्स के इनोवेशन से मोहित होते हैं। इस महान उद्यमी को वज्ञानिक समझने की भूल कर बैठते हैं। लेकिन बुनियादी विज्ञान पर जिंदगी खपा देने वाले उन वैज्ञानिकों के नाम शाम तक भुला देते हैं, जो सुबह ही नोबेल पुरस्कार से नवाजे जाते हैं।


देश में विज्ञान की इस स्थिति के लिए हमारे विद्यार्थी और उनके अभिभावक जिम्मेदार नहीं हैं। दरअसल हमारी शिक्षा प्रणाली में ऐसा बोध ही पैदा नहीं किया गया कि विज्ञान को पाठ्यक्रम में शामिल एक विषय से भी आगे समझा जाए। शायद यही वजह है कि पिछले 50 सालों में देश एक भी ऐसा वैज्ञानिक पैदा नहीं कर पाया, जिसे पूरी दुनिया उसकी अनोखी देन के कारण पहचाने। किसी भारतीय नागरिक को नोबेल भी 82 साल पहले मिला था (सीवी रमन, 1930, भौतिकी)। तब से हम भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों द्वारा अर्जित नोबेल पर ही खुशी मनाते आए हैं।


‘इंडियन साइंस कांग्रेस’ देश का सबसे बड़ा विज्ञान आयोजन है। अगले साल जनवरी में 100वीं साइंस कांग्रेस आयोजित होगी। शताब्दी समारोह मनाने का हमें शौक रहा है। उम्मीद है इसे भी धूमधाम से मनाएंगे। अभी इसमें एक साल बाकी है। ताम-झाम से अलग हटकर इस मौके पर क्या हम अगले 100 साल के लिए ऐसा साइंस विजन पेश कर सकेंगे, जो देश मंे बुनियादी विज्ञान के विकास का भरोसा दिलाए?


और चलते-चलते.. आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, वराहमिहिर, चरक.. ये विज्ञान के हमारे प्राचीन पुरोधा हंै। इन पर हमें गर्व हंै। अतीत से मोह रखना गलत बात नहीं, लेकिन क्या दो हजार साल बाद की हमारी पीढ़ियां भी केवल इन्हीं को याद करके गौरवान्वित होंगी! उम्मीद है हम उनके नॉस्टेलजिया में कुछ नए नाम जोड़ सकेंगे।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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