संपादकीय.. अगर नॉर्वे का पैमाना लागू कर दिया जाए, तो भारत के अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों की उपेक्षा के दोषी ठहरा दिए जाएंगे और यहां के तमाम बच्चों का पालन-पोषण सरकारी बालगृहों में होने लगेगा। यह बात बेहिचक कही जा सकती है कि नॉर्वे की बाल कल्याण सेवा के अधिकारियों ने अनुरूप एवं सागरिका भट्टाचार्य के बच्चों के मामलों में एक विदेशी संस्कृति के प्रति घोर असंवेदनशीलता दिखाई।
तीन साल के लड़के और साल भर से भी कम उम्र की लड़की को यह कहकर भट्टाचार्य दंपती से अलग कर दिया गया कि बच्चों को खाना हाथ से खिलाया जाता था, उनके लिए अलग बिस्तर नहीं था और उनकी उचित देखभाल नहीं हो रही थी। यानी अधिकारियों ने यह समझने की कोशिश नहीं की कि भारत में बच्चों के पालन-पोषण का क्या रिवाज है। बाद में उन्होंने यह दलील भी दी कि बच्चों की मां की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी।
भारतीय मीडिया में यह खबर प्रमुखता नहीं पाती, तो दोनों बच्चे उस पोषक परिवार में ही बने रहते, जहां उन्हें भेज दिया गया था। नॉर्वे स्थित भारतीय दूतावास भी लापरवाह रहा। मीडिया में मुद्दा उछलने के बाद ही जब भारत सरकार की नींद टूटी, तब नॉर्वे के अधिकारियों पर बच्चों को उनके परिवार में लौटाने का दबाव बना।
इसके बावजूद उन्होंने बच्चों को माता-पिता को सौंपने के बजाय उनके मामा को सौंप दिया है। यानी अभी आंशिक न्याय ही हुआ है। इस घटना ने बच्चों के पालन-पोषण पर विभिन्न संस्कृतियों में फर्क को उजागर किया है। यह ठीक है कि स्कैंडिनेवियाई देशों में बच्चों एवं महिलाओं की सुरक्षा एवं गरिमा को लेकर एक अलग तरह का पैमाना है, लेकिन वही तरीका श्रेष्ठतर है, यह दावा करने का उनके पास कोई विवेकपूर्ण आधार नहीं है।
बहरहाल, विदेशों में रहने वाले भारतीय अगर वहां के तौर-तरीकों से अवगत रहें, तो यह उचित ही होगा। उससे वैसी परेशानियों से बचा जा सकेगा, जिससे भट्टाचार्य दंपती को गुजरना पड़ा। लेकिन कोई जीवनशैली किसी पर थोपी नहीं जाए, इसे भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसमें अपनी भूमिका को लेकर भारत सरकार को जागरूक रहना होगा।