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मेहनतकशों की नई दिल्ली

 
Source: खुशवंत सिंह   |   Last Updated 00:48(24/12/11)
 
 
 
 
नई दिल्ली ने हाल ही में अपनी सौवीं सालगिरह मनाई। दिल्ली में ऐतिहासिक इमारतों और स्मारकों की कोई कमी नहीं है, लिहाजा यह भी संभव है कि सौवीं वर्षगांठ की स्मृति के तौर पर भी नई दिल्ली में एक स्मारक का निर्माण किया जाए। देश की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली शिफ्ट करने का निर्णय वर्ष 1911 में लिया गया था। किंग जॉर्ज ‘पंचम’ और उनकी रानी मेरी द्वारा आयोजित शाही दरबार में यह घोषणा की गई थी।

ऐसा माना गया था कि नई राजधानी का निर्माण उसी स्थान यानी किंग्सवे कैम्प पर ही किया जाएगा, जहां दिल्ली दरबार लगा था। लेकिन विशेषज्ञों ने इस क्षेत्र को राजधानी के लिए अनुपयुक्त पाया। वे घोड़ों पर सवार होकर आसपास के इलाकों में उपयुक्त स्थान की खोज करते रहे और अंतत: यह तय हुआ कि राजधानी के लिए रायसीना हिल सबसे उपयुक्त रहेगी।

यह भी तय किया गया कि वायसरीगल लॉज (वर्तमान राष्ट्रपति भवन) का निर्माण रायसीना हिल के सर्वोच्च स्थल पर होगा। लेकिन पांच साल तक चले प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के कारण भवन निर्माण का कार्यक्रम गड़बड़ा गया और 1920 के बाद ही वास्तविक कार्य शुरू किया जा सका।

नई दिल्ली के दो प्रमुख शिल्पकार थे : लुटियंस और बेकर। लुटियंस ने योजना बनाई थी कि हुमायूं के मकबरे के पीछे यमुना नदी पर बांध बनाकर एक विशाल जलाशय का निर्माण किया जाए, लेकिन अत्यधिक महंगी योजना होने के कारण वे ऐसा नहीं कर पाए। बहरहाल, उन्होंने शहर का बुनियादी नक्शा खींचा।

इन दो शिल्पकारों के साथ सीपीडब्ल्यूडी के दर्जनों इंजीनियरों की टीम थी। इनमें केवल एक भारतीय था : तेजा सिंह मलिक। कुछ बिल्डिंग कांट्रेक्टर्स जरूर भारतीय थे, जिनका काम था निर्माण सामग्री और मजदूरों का बंदोबस्त करना और प्रस्तावित योजना को अमली जामा पहनाना। संयोग की बात है कि वे सभी सिख थे। उनके नाम थे : सुजान सिंह और उनके पुत्र सोभा सिंह, सोभा सिंह के नजदीकी मित्र और पड़ोसी बैसाखा सिंह, नारायण सिंह, सेवा सिंह, रंजीत सिंह, धरम सिंह, मनोहर सिंह और राम सिंह।

वे सभी अशोका रोड और संसद मार्ग के बीच स्थित जंतर-मंतर के क्षेत्र में रहते थे। बाद में इसी सूची में मोहन सिंह का नाम भी जुड़ गया, जिन्होंने अमेरिकी दूतावास का निर्माण करवाया था। वे न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में रहते थे। इसके बाद नंबर आता है संगतराशों यानी पत्थरसाजों का, जो मुगल किलों और महलों के निर्माताओं के वंशज थे। नई दिल्ली बसाने के लिए ये संगतराश आगरा और पुरानी दिल्ली से आए थे।

लेकिन बिल्डर्स की टीम का सबसे अहम हिस्सा थे वे ३क् हजार मजदूर, जो राजस्थान से आए थे। इनमें पुरुषों के साथ ही महिलाएं भी थीं। पुरुषों को एक दिन की मजूरी के रूप में आठ आने दिए जाते थे और महिलाओं को छह आने। वे झुग्गी-झोपड़ियों में रहते थे, नमक और मिर्च से चपाती खाते थे और कुएं का पानी पीते थे। नई दिल्ली बसाने वालों की फौज में वे सबसे गरीब थे, लेकिन सबसे ज्यादा मन लगाकर काम भी उन्होंने ही किया था।

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दिव्य संयोग :

कुछ संयोग लगातार मुझे हैरान करते रहते हैं और मुझे उनके पीछे किसी अदृश्य हाथ की संभावनाओं में विश्वास करने को मजबूर कर देते हैं। हाल ही में ऐसा ही एक और इत्तफाक हुआ।

मेरे घर में गुरु गोबिंद सिंह की एक बड़ी सुंदर तस्वीर है। मैं अपनी आर्मचेयर पर लिखते, पढ़ते और ऊंघते हुए लंबा समय बिताता हूं और वह तस्वीर हमेशा मेरी आंखों के सामने रहती है। मैंने सोचा कि तस्वीर के नीचे कुछ पंक्तियां लिखवाई जानी चाहिए। जो पंक्ति सबसे पहले मेरे दिमाग में आई, वह थी :

गगन दमामा बाज्यो,
पड़ियो निशाने घाव।

यानी आकाश में युद्ध के नगाड़े गूंज रहे हैं, ठीक जगह पर एक जख्म हुआ है। इसके आगे की पंक्तियां मुझे याद नहीं आईं। तभी जीटीबी खालसा कॉलेज के एक युवा प्रोफेसर मुझसे मिलने आए और उन्होंने मुझे इसके आगे की पंक्तियां बता दीं। वे इस तरह हैं :

खेत जो मांडियो सूरमा,
अब झूजन का छाव।
सूरा सो पहचानिये,
जो लड़े दीन के हेत।
पुरजा-पुरजा कट मरे,
कबहू न छाड़े खेत।

उन्होंने मुझे बताया कि ये पंक्तियां गुरु गं्रथ साहिब में वर्णित हैं। कुछ दिनों बाद मुझे मासिक ‘सिख रिव्यू’ की एक प्रति मिली। कोलकाता से छपने वाली इस पत्रिका के संपादक सरन सिंह हैं। पत्रिका के प्रारंभ में हमेशा ग्रंथ साहिब का एक अंग्रेजी में अनूदित सबद प्रकाशित होता है। पत्रिका के दिसंबर अंक में वही सबद था, जो मेरे मन में जाने कितने दिनों से उमड़-घुमड़ रहा था :

जंग के नगाड़े बजने लगे,
लेकिन केवल बहादुरों ने ही संभाला मोर्चा
जमीर के सिपाही मृत्यु से भेंट करने बढ़ चले।
केवल वही एक है सूरमा
जो मजलूमों की मदद के लिए बढ़ाता है हाथ
वह डरता नहीं है तलवारों की धार से
और कभी नहीं छोड़ता है जंग का मैदान।
यह अनुवाद संभवत: पत्रिका के संपादक सरन सिंह ने ही किया है, लेकिन मुझे इसके सही होने से इतना वास्ता नहीं, जितना इस इत्तफाक से है कि जब मैं इन पंक्तियों के बारे में सोच ही रहा था, तभी वे इस रूप में मेरे सामने आ गईं। - लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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