आपसी समझ से ही चलेगी गृहस्थी
पं. विजयशंकर मेहता
| Dec 29, 2012, 00:38AM IST
मानवीय संबंधों का जहां समर्पण, नियंत्रण, प्रदर्शन और परीक्षण होता है, उस कलापूर्ण क्षेत्र का नाम है गृहस्थी। यहां सुख मिलने के तयशुदा मापदंड नहीं हैं। पति-पत्नी दोनों के लिए सुख-साधन की समान स्थितियां हों, तो भी उनमें से एक दुखी, एक सुखी नजर आ सकता है। कोई नि:संतान है, इसलिए दुखी है और किसी के पास संतान होने के बाद भी परेशान होने के पर्याप्त कारण हैं। पिछले दिनों तीन दंपती मुझसे मिले। पहले दंपती की शादी को एक साल ही हुआ था। दोनों ने मेरे पास आकर शिकायतों के साथ यह निर्णय सुनाया कि अब हम साथ नहीं रह पाएंगे। चूंकि वे मुझसे कुछ समझने आए थे, अत: इस अल्पकालिक जोड़े को मैंने कहा- धर्य रखें, समय सब ठीक कर देगा। इन्हीं दिनों संयोग से दूसरा जोड़ा मिला। उनकी शादी आठ साल पुरानी थी। एक साल पहले झंझटें शुरू हुईं और दोनों एक-एक बच्चे के साथ अलग हो गए। अब कानून की मदद ली जा रही है। मैंने सलाह दी, एक-दूसरे को जीतने की जगह जीने की कोशिश करें। लेकिन मेरे लिए चौंकने की बात तब हुई, जब तीस साल पुराना जोड़ा मेरे पास आकर निर्णय सुनाता है कि अब साथ में रहा नहीं जाता। तब मेरा आग्रह था- अब गृहस्थी में पति-पत्नी अपने मतभेदों को इश्यू न मानें। पढ़े-लिखे हैं तो मतभेद होंगे ही। अब गृहस्थी समझ से चलेगी। समझ, सतत शिक्षा जैसी है। तीस साल बाद भी इसकी जरूरत पड़ेगी दांपत्य बचाने में। पति-पत्नी होना केवल दो शरीरों का मिलन नहीं है, यह एक दायित्व भी है; पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय। दायित्व का दायरा व्यापक हो तो समझ काम आएगी कि छोटी-छोटी बातों से विघटन नहीं हुआ करते।
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