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कितनी सफल मोदी-ब्रांड राजनीति?

हर्ष मंदर | Dec 07, 2012, 00:12AM IST
कितनी सफल मोदी-ब्रांड राजनीति?
कभी  महात्मा गांधी की समावेशी, नैतिकतापूर्ण, और अहिंसक राजनीति की पोषक रही गुजरात की माटी आज बिल्कुल अलग तरह की राजनीति की गिरफ्त में है, जिसे त्रिदिप सुहरुद जैसे टिप्पणीकार ने ‘अति-मर्दाना’, विभाजनकारी और अधिनायकवादी राजनीति कहा है।
 
नए ब्रांड की यह राजनीति न सिर्फ इसके प्रैक्टिशनर नरेंद्र मोदी की नियति तय करेगी, वरन इसकी सफलता देश के लोगों की तकदीर बदल सकती है। कुछ लोग मानते हैं कि मोदी भारत के सबसे काबिल नेता हैं। उनके प्रभावी चीयरलीडर्स में देश के कई प्रमुख उद्योगपति, वरिष्ठ नौकरशाह, प्रोफेशनल्स व जाने-माने व्यापारी शामिल हैं। वहीं कुछ लोगों का यह भी मानना है कि उनका बढ़ता प्रभाव हमारे बहुलतावादी लोकतंत्र और सामाजिक व आर्थिक समता के लिहाज से बेहद खतरनाक है।
 
इस तरह एक ही प्रशासन का इतने मुख्तलिफ तरीके से मूल्यांकन बेहद असामान्य लगता है। एक राय यह है कि सरकारों को मुख्यत: बाजारोन्मुखी आर्थिक विकास के सरलीकरण के लिए प्रभावी ढंग से काम करना चाहिए। वहीं इसके उलट कुछ लोग यह भी कहते हैं कि सरकार के कामकाज का मूल्यांकन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि उसने सर्वाधिक अभावग्रस्त लोगों की बेहतरी के लिए क्या किया है। जो लोग पहली राय से इत्तफाक रखते हैं, उनके हिसाब से मोदी देश के सबसे सफल प्रशासक हैं, वहीं दूसरी तरह की राय रखने वाले लोगों की नजर में वह सबसे नाकाम नेता हैं। 
 
उद्योगपति मुकेश अंबानी मोदी के नेतृत्व को ‘प्रभावी, दूरदर्शी और जोशीला’ मानते हैं। उनके भाई अनिल अंबानी उन्हें बतौर प्रशासक ऐसा ‘रोलमॉडल’ मानते हैं, जिनका अन्य राज्यों को भी अनुसरण करना चाहिए। रतन टाटा उन्हें एक ‘अनुकरणीय’ नेता मानते हैं। टाटा के मुताबिक मोदी जो कहते हैं, उसे प्रभावी ढंग से पूरा भी करते हैं। सुनील मित्तल की राय में मोदी प्रधानमंत्री मटेरियल हैं।
 
यदि अच्छे शासन का पैमाना सफल रूप से कारोबार व निवेश के अनुकूल माहौल बनाना है, तो कम से कम इस लिहाज से मोदी सरकार का प्रदर्शन प्रशंसनीय लगता है। दहाई अंकों में पहुंच चुकी गुजरात की विकासदर देश के कई राज्यों से अधिक है। देश की महज 5 फीसदी आबादी के साथ गुजरात ने 2009 में हमारे कुल निर्यात में 21 फीसदी और औद्योगिक उत्पादन में 13 फीसदी योगदान दिया। फिर भी जैसा सुरेंद्र ने ‘फ्रंटलाइन’ में लिखा कि मोदी के आने से 21 साल पहले वर्ष 1980 में गुजरात देश के तीन सर्वाधिक तेजी से बढ़ते राज्यों में शामिल था। 
 
इसकी निवेश को बढ़ावा देने वाले राज्य की छवि बाद में गढ़ी गई, जब इसने पश्चिम बंगाल के सिंगुर से कड़वा अनुभव लेकर लौटे रतन टाटा को वर्ष 2008 में उनकी लघु कार परियोजना के लिए आसानी से जमीन उपलब्ध करवा दी। लेकिन इसमें से ज्यादातर जमीन गुजरात औद्योगिक विकास निगम द्वारा नियंत्रित थी, वहीं किसानों के स्वामित्व वाला जमीन का छोटा-सा टुकड़ा मामूली प्रतिरोध के बाद बाजार से ऊंची कीमतों में खरीद लिया गया। सरकार ने टाटा समेत अनके बड़ी इंडस्ट्रीज को अभूतपूर्व कर रियायतें दीं। अर्थशास्त्री इंदिरा हिर्वे के मुताबिक गुजरात सरकार विकास की बजाय इंसेंटिव्स पर ज्यादा खर्च कर रही है। इसे वह एक तरह का ‘मिलीभगत का पूंजीवाद’ मानती हैं, जिसके तहत उद्योगपति गुजरात में अपने बेस इसलिए स्थापित करते हैं, क्योंकि सरकार उन्हें कई तरह की रियायतें देती है। 
 
लेकिन यदि हम इस सरकार का आकलन गरीबी, भेदभाव से निपटने की इसकी क्षमता के आधार पर करें तो यह आश्चर्यजनक ढंग से फिसड्डी नजर आती है। वर्ष 2005 से 2010 के बीच गुजरात में गरीबी 8.6 फीसदी घटी, जो ओडिशा (19.2 फीसदी), महाराष्ट्र (13.7 फीसदी) और तमिलनाडु (13.1 फीसदी) से कहीं पीछे है। आईएफआरपीआई ने गुजरात के भूख सूचकांक को ‘खतरनाक’ स्तर पर पाया। यह भुखमरी के मामले में ओडिशा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से भी पीछे है।
 
यहां पांच साल से कम उम्र के 45 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। यहां कन्या शिशु मृत्युदर प्रति 1000 पर 51 है, जो राष्ट्रीय औसत (49) से ज्यादा है। 2001 से 2011 के बीच लिंगानुपात प्रति 1000 पुरुष पर 920 से गिरकर 918 पर पहुंच गया, जो 940 के राष्ट्रीय औसत से कहीं कम है।
 
वहीं सामाजिक समता के लिहाज से मोदी सरकार का सबसे संगीन दोष इसके अपने अल्पसंख्यकों से खुलेआम दुरावपूर्ण संबंध हैं। वर्ष 2002 के गुजरात दंगे और इसमें मोदी प्रशासन की कथित भूमिका के बारे में काफी कुछ लिखा व कहा जा चुका है। लेकिन इस पर ज्यादा गौर नहीं किया गया कि मोदी की विकास योजनाएं भी अल्पसंख्यकों तक नहीं पहुंची हैं।
 
मुस्लिम बस्तियों में सड़कों, साफ-सफाई, पेयजल व विद्युत आपूर्ति की स्थिति अन्य इलाकों की तुलना में काफी खराब है। देश में एकमात्र गुजरात सरकार ऐसी है, जिसने केंद्र द्वारा अल्पसंख्यक बच्चों के लिए प्रायोजित छात्रवृत्ति योजनाओं में राज्य के तौर पर अपना हिस्सा देने से इनकार कर दिया। 
 
गांधीजी का कहना था कि कोई भी नीति तय करते वक्त यह सोचना चाहिए कि इसका सबसे कमजोर व्यक्ति पर क्या असर होगा। मौजूदा गुजरात में सबसे कमजोर संभवत: वहां की नारी जाति होगी- चाहे यह खाने से वंचित कोई लड़की हो, एक दंगा पीड़ित, विस्थापित आदिवासी या फिर कोई मजदूर। क्या उसकी उम्मीदें एक मर्दाना, कारोबार-हितैषी, अधिनायकवादी और अल्पसंख्यकों का दमन करने वाली सरकार से पूरी हो सकती हैं? या फिर उसे ऐसी सरकार तलाशनी होगी, जो उसकी परवाह करे, उसकी गरिमा का ख्याल रखे, जो उसके अपने व अपने प्रियजनों के लिए भोजन, काम, स्वास्थ्य सुविधाएं और शिक्षा पाने के प्रयासों में सहभागी बने? 
 
उसकी पसंद (यदि वह ऐसा कर सके तो) हमारी सामूहिक तकदीरों का निर्धारण कर सकती है।
 
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)
 
हर्ष मंदर
 
डायरेक्टर, सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज     
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