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शर्म हमको मगर नहीं आती..

चेतन भगत | Nov 03, 2012, 02:00AM IST
 
 

पिछले हफ्ते भाजपा ने अपने पार्टी अध्यक्ष के तौर पर नितिन गडकरी का जमकर बचाव किया। शुगर बिजनेस चलाने वाले गडकरी ने अपनी कंपनी के साथ दर्जनों छद्म कंपनियों, फर्जी पतों और संदिग्ध डायरेक्टरों का एक जाल निर्मित करते हुए अपने कारोबार को आगे बढ़ाया।
 
उन्होंने लोकनिर्माण मंत्री रहते हुए जिन इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को ठेके दिलवाए, उन्हीं से कर्ज भी लिए। भाजपा द्वारा उनके बचाव में पहला तर्क तो यही था कि ‘अभी तक कुछ भी गलत साबित नहीं हुआ है’, मानो गडकरी ने ये तमाम फर्जी कंपनियां यूं ही मजाक में बनाई थीं। दूसरा तर्क था- ‘जरा देखें कि कांग्रेस ने क्या किया’। 
 
भाजपा द्वारा गडकरी का बचाव करने से खासकर ऐसे लोगों को काफी हैरत हुई, जो उसे अलग तरह की पार्टी मानते थे। भाजपा ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक पूरा सत्र सदन की कार्यवाही नहीं चलने दी। उसके नेता (गडकरी भी) भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने वाले बाबा रामदेव जैसे लोगों के साथ एक मंच पर नजर आते हैं। इसके बावजूद भाजपा द्वारा गडकरी का बचाव करना दर्शाता है कि उसे शुचिता की तभी परवाह होती है, जब आरोपी कांग्रेस का हो। 
 
गडकरी को संघ परिवार से भी समर्थन मिला। संघ की वेबसाइट में उसका विजन ‘उच्च नैतिक मूल्यों पर आधारित भारत की राष्ट्रीय गरिमा की दिशा में काम करना’ बताया गया है। आखिर कौन-सा हिंदू धर्मग्रंथ कर अपवंचन तथा कारोबारियों द्वारा राजनेताओं को कर्ज देने की इजाजत देता है, जहां साफ तौर पर निहित स्वार्थ जुड़े हों? क्या गडकरी के कृत्य उच्च नैतिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं? हिंदू धर्मग्रंथों के मुताबिक तो धर्म संरक्षक नैतिकता की खातिर अपने परिजनों तक को कुर्बान कर देते हैं। मगर संघ गडकरी के खिलाफ कदम नहीं उठाता क्योंकि वह उनके ही स्कूल से निकले हैं। 
 
हालांकि इस लेख का उद्देश्य कुछ संगठनों की दोहरी प्रवृत्ति पर भड़ास निकालना या गडकरी जैसे नेताओं पर आरोप लगाना नहीं है। यह समझना ज्यादा जरूरी है कि आखिर क्यों तमाम पार्टियां अपने भ्रष्ट सदस्यों के खिलाफ भीषण आरोपों और पर्याप्त परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के बावजूद उनका समर्थन करने लगती हैं? इसका जवाब हम भारतीयों के सोचने के तरीके में निहित है। राजनेताओं पर तोहमत लगाना आसान है, लेकिन यह तथ्य भी अपनी जगह कायम है कि हमारे राजनेता सदाचारी नहीं हैं, क्योंकि हम सदाचारी नहीं हैं।  
 
एक आम, कड़वी हकीकत यह है कि मतदाता वित्तीय धांधली की ज्यादा परवाह नहीं करते। थोड़ा-बहुत भ्रष्टाचार तो तकरीबन प्रत्याशित और स्वीकार्य माना जाता है। लेकिन जब भ्रष्टाचार व्यापक पैमाने पर प्रत्यक्ष और अक्खड़ तरीके से किया जाता है, तभी हम भारतीय परेशान होते हैं, वह भी थोड़े समय के लिए। मानो हम उनसे कहना चाहते हों कि ‘भ्रष्टाचार करें, लेकिन इतने खुल्लम-खुल्ला तरीके से हमारे मुंह पर नहीं।’ कर चोरी, उलझाऊ लेखांकन और संदिग्ध दोस्तियों को तो भारतीय कारोबारियों के सामान्य व्यवहार की तरह देखा जाता है। हम इसे इस तरह लेते हैं मानो कोई चार प्लेट मिठाई खा ले। इसमें थोड़ी लोलुपता जरूर है, लेकिन चलता है। 
 
जब तक हम एक समाज के तौर पर भ्रष्टाचार, अनैतिक व्यवहार और भाई-भतीजावाद को विकट समस्या मानते हुए इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं देते, हमारे राजनेता नहीं बदलेंगे। एक काल्पनिक स्थिति पर गौर करें। मान लें कि कोई प्रतिष्ठित राजनेता किसी मंदिर में जूता पहने और शराब की बोतल हाथ में लिए पहुंच जाता है और देव-प्रतिमा का अनादर करता है। ऐसे में क्या होगा? जाहिर तौर पर वहां बड़ा सामाजिक बवाल हो जाएगा। हमारे मन में अपने धार्मिक स्थलों के प्रति बेहद सम्मान है। ऐसे व्यक्ति को कभी भी पार्टी अध्यक्ष नहीं रहने दिया जाएगा। पूरी संभावना है कि उसका राजनीतिक कॅरियर रातोंरात खत्म हो जाए। 
 
लेकिन जब हम संदिग्ध कारोबार होते, सरकारी खजाना लुटते या राजनेताओं को निजहित को देशहित से ऊपर रखते हुए देखते हैं, तब हमारे मन में ऐसे भाव नहीं जागते। शक्ति के दुरुपयोग के बारे में भी हम सिर्फ सार्वजनिक जीवन में बात करते हैं। हम चाहते हैं कि राजनेता शक्ति का दुरुपयोग न करें, लेकिन खुद ऐसा करते हैं। एक मिसाल पेश है। भारत में घरेलू नौकर/नौकरानियों का स्तर क्या है? वे काम पर रखने वाले घरमालिक/मालकिन की तुलना में शक्तिहीन होते हैं। अब सोचें कि हम उनके साथ कैसा बर्ताव करते हैं? क्या हम कभी भी उनके लिए न्यूनतम मजदूरी या हफ्ते में एक अनिवार्य छुट्टी की बात करते हैं? जब हमें अपनी शक्ति के दुरुपयोग का कोई मलाल नहीं है, तो दूसरों पर ऐसा करने के लिए हमला करना मुश्किल हो जाता है। 
 
हमें यानी भारतीय समाज को इस पर चिंतन करने की जरूरत है कि हम क्या बन गए हैं। आरएसएस जैसे संगठनों को अपने किसी संदिग्ध कारोबारी सदस्य का बचाव करने के बजाय समाज में उच्च नैतिक मूल्यों की स्थापना पर जोर देना चाहिए। आईएसी (इंडिया अगेंस्ट करप्शन) जैसे संगठनों को भी इस बात का प्रचार करना चाहिए कि यह हमारे भीतर उच्च नैतिक मूल्यों का अभाव ही है, जिसने देश को भ्रष्ट बना दिया है। किसी भी चीज से अधिक हमें खुद को बदलना होगा। नैतिक मूल्यों के बगैर कोई भी समाज चल नहीं सकता, प्रगति करने की तो खैर बात ही छोड़ दें। जब यह अहसास आज की तुलना में कहीं ज्यादा भारतीयों के मन में आ जाएगा, तो हमारे राजनेता भी बदल जाएंगे। ऐसे में राजनीतिक दल भी अपने भ्रष्ट सदस्यों को हटा देंगे। फिलवक्त वे ऐसा नहीं करते, क्योंकि उन्हें लगता है कि आप मतदाताओं को इसकी परवाह नहीं है। 
 
हम फिलहाल बेशर्मी के दौर में रह रहे हैं। जब शर्म हमें उद्वेलित करेगी और हम आत्मचिंतन को प्रवृत्त होंगे, तो हमारा देश बदलाव के लिए तैयार हो जाएगा। हमने भ्रष्ट नेताओं के बारे में कई खुलासे देखे हैं। अब समय आ गया है कि हम अपने आप पर एक खुलासा करें।
 
 
चेतन भगत
 
अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार   
 
 
 

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