स्थिरता का भरोसा जगाए भाजपा
चेतन भगत
| Nov 29, 2012, 00:03AM IST

इंडियन क्रिकेट टीम की एक खासियत है कि यह अक्सर किसी आसान लगने वाले मैच को भी कांटे का मुकाबला बना देती है। भारतीय राजनीति में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति है, जहां पर भाजपा अपनी उस जबरदस्त राजनीतिक बढ़त को गंवाने में लगी है, जो पिछले साल मिली थी।
कांग्रेसनीत सरकार के घोटाले सुर्खियां बनाने के साथ किसी को भी लगा होगा कि 2014 के चुनाव भाजपा के लिए बेहद आसान होंगे। पर अब ऐसा नहीं लगता। देश का नेतृत्व करने की योजनाएं बनाने के बजाय भाजपा के भीतर अंदरूनी कलह, परस्पर-विरोधी संदेशों और अहं के टकराव जैसी आम समस्याएं फिर उभर आई हैं।
बहुत सारी प्रतिभाएं, बहुत सारे अहं और बहुत ही कम विचार या योजनाएं इस पार्टी को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं। इसी बीच कांग्रेस करदाताओं की रकम को चुनाव से ऐन पहले लाखों ‘आधार’ कार्डधारकों के खातों में पहुंचाने की योजना बना रही है। सब जानते हैं कि खातों में मुफ्त नकदी का विचार वोटरों को लुभा सकता है। ऐसे में लगता नहीं कि भाजपा के लिए मुकाबला आसान होगा।
भाजपा भारत के लिए एक गैर-वंशवादी, गैर-गांधी विकल्प का प्रतिनिधित्व करती है। जब भाजपा लड़खड़ाती है तो सिर्फ यह पार्टी या इसके लोग ही नहीं लड़खड़ाते। यह इस बात का संकेत है कि हम भारतीय अब भी खुद को गांधी परिवार से दूर करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। भले ही हमने एक लोकतंत्र का निर्माण किया हो, लेकिन मन की गहराइयों में हम कहीं न कहीं आज भी शीर्ष पर राजाओं को ही प्राथमिकता देते हैं।
भाजपा (जहां पर तकनीकी रूप से कोई भी शीर्ष पर पहुंच सकता है) ज्यादा लोकतांत्रिक है। लेकिन वह या तो चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं करती या खुद को ढंग से संभाल नहीं पाती। जब देशवासी एक गैर-वंशवादी पार्टी की इस अस्थिरता को देखते हैं तो वे पुन: गांधी परिवार को वोट देने लगते हैं। यह कमोबेश वैसा ही है, जैसे लोग सोना खरीदें और संकट के समय इसे तकिए के नीचे छिपा दें। यह भले ही सर्वश्रेष्ठ निवेश न हो, लेकिन किसी अनिश्चित चीजों में पैसा डालने से तो यह अच्छा ही है।
यहां तक कि कांग्रेसी समर्थक भी इस बात से सहमत होंगे कि वंशवादी व्यवस्था देश के लिए सर्वश्रेष्ठ नेता चुनने के लिए सर्वोत्कृष्ट नहीं है। अलबत्ता यह अविश्वसनीय और अस्थिर विकल्प से तो बेहतर ही है।
आखिर भाजपा लगातार इस तरह अंदरूनी विवादों से क्यों ग्रस्त रहती है? क्यों यह देशवासियों के समक्ष स्थिरता व निरंतरता की छवि पेश नहीं कर पाती? इनसे भी अहम सवाल यह कि क्या हम भारतीय किसी पूर्व निर्धारित राजवंश की तुलना में अपने भीतर से किसी को नेता चुनने लायक नहीं हैं?
जहां तक पहले सवाल की बात है तो अंदरूनी कलह तब होती है, जब व्यक्तियों व संस्था की आकांक्षाओं के बीच आपस में मेल नहीं होता। कांग्रेस को शीर्ष नेतृत्व तय करने के बारे में कोई स्पष्ट नीति की जरूरत नहीं है। शीर्ष नेता गांधी परिवार से ही होंगे। अगली पंक्ति में गांधी परिवार के सर्वाधिक पसंदीदा लोग होंगे। यह परिवार लोगों को प्रमोट करने के लिए कुछ प्रतिभा चयन संबंधी तरीके इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन यदि वह ऐसा नहीं भी करता, तो भी सदस्य ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। इसी परिवार के पास वीटो पावर होता है।
अलबत्ता भाजपा इस तरह नहीं चल सकती और न ही चलाई जाती है। पार्टी सदस्यों को अपनी राय जाहिर करने की आजादी है, चाहे वे किसी भी पद पर हों। यह बेहतर समाधान तलाशने और कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिहाज से अच्छी बात है। हालांकि इसके चलते कई बार आजादी का दुरुपयोग भी होने लगता है या सदस्यों के बीच कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर गलत संवाद की स्थिति निर्मित हो सकती है। ऐसे मामलों में नीतियों व प्रक्रियाओं को ज्यादा उद्देश्यपरक व पारदर्शी होना चाहिए। इन्हें ज्यादा सही तरीके से दूसरों तक पहुंचाना भी चाहिए।
अब दूसरे सवाल की बात। भाजपा वास्तव में किसका प्रतिनिधित्व करती है, इस बात को लेकर स्पष्ट समझ नहीं है।
इसी वजह से वह लोगों को स्थिरता का भरोसा नहीं दे पाती। हिंदुत्व का मूल संदेश पुराना पड़ गया, भ्रष्टाचार-विरोध पर उसका दोहरा रवैया उजागर हो चुका है और अन्य पार्टियों ने पहले ही ‘गरीब-समर्थक’ होने का झंडा उठा रखा है। खासकर युवा नहीं जानते कि भाजपा से क्या उम्मीद की जाए। जहां यह पूंजीवादी और कारोबारी नीतियों की समर्थक रही है, वहीं खुदरा में एफडीआई पर इसके विरोध से भ्रम पैदा हुआ। यह भ्रष्टाचार-विरोधी होने का दावा करती है, लेकिन अपने ही सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई करने में इसे मुश्किल होती है। उसे अपनी एक नई समकालीन पहचान तलाशनी होगी। इसे खुद को ऐसे नवीन भारत के साथ जोड़ना होगा, जैसा युवा देखना चाहते हैं। वरीयता-प्रधान, सक्षम, जवाबदेह और प्रगतिशील भारत।
तीसरा बड़ा मसला यह है कि क्या हमें अपने नेता चुनने के लिहाज से खुद पर पर्याप्त भरोसा है? संभवत: मन की गहराई में हम जानते हैं कि हम सब कहीं न कहीं अनैतिक हैं। लिहाजा, जब कोई हमारा नेतृत्व करने का दावा करता है तो हम उसमें दोष निकालने लगते हैं। लेकिन किसी राजवंश को ऐसे निराशावाद का सामना नहीं करना पड़ता। हमारी सामंती मानसिकता तुरंत उन्हें स्वीकार कर लेती है, जो हमारा नेतृत्व कर चुके हैं और हम चाहते हैं कि वे आगे भी नेतृत्व करते रहें। भले ही हमें लगता हो कि हम उनसे बेहतर कर सकते हैं। हम एक बेहतर नेतृत्व पाना चाहते हैं, लेकिन जोखिम उठाना और चीजों को बदलना नहीं चाहते। खुद को गांधी परिवार से दूर हटाना मुश्किल हो सकता है, लेकिन यह जरूरी है। इससे अल्पकालीन अस्थिरता आ सकती है। लेकिन अंतत: चीजें सुधर जाएंगी। बदलाव के प्रति यह सकारात्मक नजरिया ही मतदाताओं को भाजपा जैसी पार्टियों की ओर तथा वंशवादियों से दूर ले जाएगा। तब तक भाजपा थोड़ा आत्मावलोकन करते हुए यह देखे कि वह क्या कर सकती है।
चेतन भगत
अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार






