जनता का कोप ज्यादा डरावना या सेना का गुस्सा?
Source: एम.जे. अकबर | Last Updated 00:12(15/01/12)
पाक में पहले तख्ता पलट का नेतृत्व एक असैन्य व्यक्ति ने किया था। जब नौकरशाह से गवर्नर जनरल बने गुलाम मोहम्मद ने 17 अप्रैल 1953 को मनमाने ढंग से प्रधानमंत्री ख्वाजा नजीमुद्दीन को बर्खास्त कर दिया, तब वे ब्रिटेन की क्वीन एलिजाबेथ द्वारा हस्तक्षेप को लेकर थोड़े आशंकित थे। उनके पास चिंतित होने के कारण थे, क्योंकि पाकिस्तान उस समय तक स्वाधीन-उपनिवेश था और क्वीन उसकी वैधानिक रानी थीं।
2 मार्च 1956 को जब पाकिस्तान ने लोकतांत्रिक संविधान ग्रहण किया, तब वह पूर्ण स्वाधीन बना, लेकिन उसे लोकतंत्र बनने का मौका ही नहीं मिला, क्योंकि आम चुनाव हो सकते, इसके पहले ही जनरल अयूब खान ने सैन्य तख्ता पलट के जरिए सत्ता हथिया ली। अजीब बात यह है कि 56 साल बाद भी इसके असैन्य शासक संकट के समय मदद के लिए विदेशों की ओर ही देखते हैं।
कुछ हफ्ते पहले राष्ट्रपति आसिफ जरदारी द्वारा वाशिंगटन में अपने दूत हुसैन हक्कानी के हाथों एडमिरल माइक मुलेन को सौंपे कुख्यात मेमो के माध्यम से अमेरिका से की गई अपील और इस हफ्ते प्रधानमंत्री यूसुफ गिलानी द्वारा ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरून को पाकिस्तानी सेना द्वारा संभावित सत्ता पलट के खिलाफ मदद के लिए किए गए हताश फोन कॉल में सिर्फ अंश का ही अंतर है।
अगर पहले को ‘मेमोगेट’ का नाम दिया गया है, तो दूसरे को बिल्कुल इसी तरह ‘फोनोगेट’ के नाम से जाना जा सकता है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने काफी हद तक दयनीय ढंग से अपनी लाचारी और कमजोरी उघाड़ दी है। उनका संवैधानिक अधिकार उन्हें इजाजत देता है कि वे सेना प्रमुख अशफाक कयानी को भी उतनी ही आसानी से हटा दें, जैसे उन्होंने रक्षा सचिव नईम खालिद लोदी को बर्खास्त किया। उनका राजनीतिक निर्धारण उन्हें बताता है कि ऐसे किसी आदेश को मानने की बजाय, सेना उन्हें जेल में ठूंस देगी।
हम नहीं जानते कि क्या जरदारी ने ऐसी ही अपील इस्लामाबाद के बड़े भाई सऊदी अरब से भी की है, लेकिन तमाम संभावनाओं में उत्तर स्वीकारोक्ति में ही है। निश्चित तौर पर सत्ता के ज्यादातर अभिलाषियों में अपने अवसरों को लेकर रियाद को टटोलने की प्रवृत्ति होती है।
ऐसा करने वाले सबसे हालिया आदमी हैं पूर्व तानाशाह परवेज मुशर्रफ, जिन्होंने एक लोकप्रिय जन आंदोलन के जरिए निकाल बाहर किए जाने के बाद अपनी वापसी की गाड़ी के रूप में ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग का गठन किया है। आखिर क्यों तानाशाह अपनी कल्पना में खुद को पुन: गढ़कर मुक्तिदाता के रूप में देखते हैं? यह मानवीय कल्पनाशक्ति की सबसे गूढ़ उड़ानों में से एक है।
जरदारी का घरेलू राजनीतिक दर्शन साफ तौर पर इस विश्व प्रसिद्ध कहावत से प्रेरित है कि जो लड़ता है और भाग खड़ा होता है, वह दूसरे दिन लड़ने के लिए जीवित बचा रहता है। कभी-कभी उनके करीबी और अभिन्न गिलानी कयामत के दिन को दूर रखने की कोशिश में मौखिक तौर पर पीछे हटते हैं और उन जनरलों की तारीफ करते हैं, जो उन्हें धूल में मिला देंगे। अन्य मौकों पर वे खुद अपने ‘घर’ दुबई की ओर शारीरिक रूप से पीछे हटते लगते हैं।
वे पहले पाकिस्तानी राष्ट्रपति हैं, जिनका एक कार्यालय इस्लामाबाद में है और एक घर दुबई में। कुछ हफ्ते पहले वे हार्ट अटैक के चलते दुबई के लिए उड़नछू हो गए। पिछले बृहस्पतिवार को एक और संकट के क्षण में वे एक शादी में शामिल होने के लिए उड़ गए, जिसमें लगता है कि किसी और को नहीं बुलाया गया था। और यह उनकी खुद की शादी नहीं थी।
दुबई के लिए यह फुर्ती हमेशा ही रहस्यमय और घबराहट से आच्छादित होती है, मानो उनके बचे रहने के लिए सत्य गंभीर नुकसानदेह बन सकता है। कोई भी हैरान हो सकता है कि ऐसी यात्राओं के लिए प्रोटोकॉल क्या होता है। क्या जरदारी को वीसा की जरूरत पड़ती है? वे अपनी निजी व्यवस्था से जाते हैं या सरकारी जेट से?
विदेशी मदद के लिए ये व्याकुल याचनाएं हालांकि लक्ष्य से पूरी तरह चूक जाती हैं। सेना ने बड़ी अक्लमंदी से कार्रवाई का विकल्प चुना है और यह उसके अधिकारियों व दस्ते के जरिए नहीं, सुप्रीम कोर्ट के जरिए है। यह एक त्रिकोणीय संकट है और चूंकि सरकार ने जरदारी के जाने-पहचाने विदेशी बैंक खातों की जांच की मांग ठुकरा दी है, इसमें भ्रष्टाचार का मोटा आवरण भी है। यह बात विवाद से परे है कि जरदारी सरकार की साख हिमांक बिंदु से भी नीचे है। नैतिकता ऐसी चीज नहीं है, जिसे किसी को हमारे उपमहाद्वीप की बहसों में आसानी से शामिल करना चाहिए, नहीं तो कोई भी सरकार बच नहीं पाएगी। पर यहां भी कई डिग्रियां हैं। जरदारी सरकार का नैतिक अधिकार ऋणात्मक क्षेत्र में है।
यहां पर उस तख्ता पलट को रोकने के लिए एक पूरी तरह से तर्कसंगत और वैध तरीका है, जो कोई नहीं चाहता, संभवत: सेना के ऊंचे अफसर भी नहीं। सरकार को नए चुनावों की घोषणा करनी चाहिए। जनता को तय करने दें। और दवा के इस इंजेक्शन के माध्यम से व्यवस्था में घर कर गया वह जहर साफ हो जाएगा, जो बड़ी तेजी से उसे खत्म कर रहा है।
यहां तक कि देशभक्ति की एक कमजोर सी नकल भी, जो मूलत: किसी के व्यक्तिगत हित के आगे देश को रखने जैसी है, सत्तारूढ़ वर्ग को विश्वास दिला देगी कि पाकिस्तान के पास कोई और विकल्प बचा ही नहीं है। सेना, चुनाव रोकने के लिए तख्ता पलट की कोशिश का दुस्साहस नहीं करेगी, क्योंकि उसकी कीमत जनता पर आघात होगी।
एक हालिया प्यू सर्वेक्षण ने दिखाया है कि 80 फीसदी पाकिस्तानी मानते हैं कि उनकी सेना एक सकारात्मक शक्ति है। कोई भी सेना प्रमुख एक संस्था में जनता की आस्था को अपनी अल्पकालिक देखभाल के तले क्षति पहुंचाने का दुस्साहस नहीं करेगा। निश्चित तौर पर, ऐसा नेताओं में हुआ है।
यदि जरदारी और गिलानी इस विचार का प्रतिरोध करते हैं, तो वे ऐसा सिर्फ इसलिए कर सकते हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि जनता का कोप सेना के गुस्से से ज्यादा प्रचंड हो सकता है। ख्वाजा नजीमुद्दीन के पास लोगों तक जाने का विकल्प नहीं था। उन्हें मौका मिलता, तो जरूर जाते। वे उस पीढ़ी के थे, जिसने पाकिस्तान का निर्माण किया, न कि उस किस्म के, जिसने देश को चूस डाला है। - लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।