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मोर्सी की जिद मिस्र की मुसीबत

Bhaskar News | Dec 11, 2012, 23:41PM IST
 
 

मिस्र में राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी नए संविधान के विवादास्पद प्रारूप को जनमतसंग्रह में पास कराने पर अड़े हैं, जिससे देश में टकराव बढ़ने के हालात बन गए हैं।
 
मोर्सी ने अपने विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सेना को पुलिस के अधिकार दे दिए हैं। इसका व्यावहारिक मतलब यह है कि जनमतसंग्रह कराने के लिए सेना को ड्यूटी पर तैनात किया जाएगा। इस तरह अपनी 22 नवंबर की विवादित अधिघोषणा को वापस लेकर मोर्सी ने अपने रुख में जिस नरमी का संकेत दिया, वह क्षणिक साबित हुआ है।
 
दूसरी तरफ प्रारूप की विरोधी धर्मनिरपेक्ष ताकतें भी झुकने को तैयार नहीं हैं। नेशनल सैलवेशन फ्रंट (राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चे) नाम से इकट्ठा हुई ये ताकतें जानती हैं कि अगर इस मौके पर उन्होंने निर्णायक संघर्ष नहीं किया, तो देश में शरीयत 
व्यवस्था लागू हो जाएगी, जिसके तहत उन उसूलों के लिए कोई जगह नहीं होगी, जिन्हें आदर्श मानकर उन्होंने पिछले साल होस्नी मुबारक की तानाशाही से संघर्ष किया था।
 
इसलिए उनकी सर्व-प्रमुख मांग 15 दिसंबर को होने वाले जनमतसंग्रह को रोकने की है। आरोप है कि प्रस्तावित संविधान में महिलाओं, ईसाई एवं अन्य अल्पसंख्यक समुदायों और आधुनिक नागरिक अधिकारों की उपेक्षा की गई है। दरअसल, मिस्र में संविधान के मुद्दे पर उभरा टकराव भावी व्यवस्था को लेकर जारी वैचारिक संघर्ष का परिणाम है।
 
संविधान सभा में अल्पमत की अनदेखी करने वाली इस्लामी ताकतें- खासकर मुस्लिम ब्रदरहुड- अधिक संगठित हैं, इसलिए संभावना है कि जनमतसंग्रह में प्रस्तावित संविधान को मंजूरी मिल जाएगी। स्पष्टत:  जनमतसंग्रह को स्थगित करवाना विपक्ष की प्राथमिकता है। ऐसा नहीं हुआ तो विपक्ष के सामने सबसे माकूल विकल्प संभवत: यही होगा कि वह बहिष्कार कर जनमतसंग्रह की वैधता खत्म करने की कोशिश करे। लेकिन इससे मोर्सी और इस्लामी ताकतों पर कोई फौरी फर्क पड़ेगा, ऐसा नहीं लगता।
 
बहरहाल, हाल के प्रदर्शनों में धर्मनिरपेक्ष ताकतों की ताकत भी दिखी है। उनके साथ भी एक बड़ा जन समर्थन है। इसलिए वे लंबी लड़ाई लड़ने की स्थिति में हैं। अत: अगले शनिवार को राष्ट्रपति मोर्सी अगर अपनी पसंद के संविधान पर जनता के बहुमत की मुहर लगवाने में सफल हो जाते हैं, तब भी वे चैन से शासन करने की उम्मीद शायद ही कर सकते हैं।
 

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