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‘नाम’ के बहाने अपना काम

वेदप्रताप वैदिक | Sep 05, 2012, 00:36AM IST
 
 

गुट-निरपेक्ष आंदोलन को अंग्रेजी में नॉन-एलाइंड मूवमेंट कहते हैं। इसका संक्षिप्त अंग्रेजी शब्द ‘नाम’ है। अब यह ‘नाम’ सिर्फ नाम भर का रह गया है। आज की दुनिया में जब कोई गुट ही नहीं रह गया है तो आप ‘निरपेक्ष’ किससे रहेंगे? शीत-युद्ध के दौरान अमेरिकी और सोवियत, ये दो सैन्य-गुट बन गए थे। इनसे समदूरी रखने वाले देशों- भारत, मिस्र और यूगोस्लाविया ने तीसरी दुनिया के अनेक नव-स्वतंत्र देशों को मिलाकर जो आंदोलन खड़ा किया था, वह संयुक्त राष्ट्र संघ के बाद सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय संगठन बन गया था।

उस समय उसकी भूमिका थी, लेकिन वह अब सिर्फ कर्मकांड रह गया है। ईरान में पिछले हफ्ते हुए गुट-निरपेक्ष सम्मेलन की नियति भी यही रही। तेहरान में हुए इस सम्मेलन में 120 देशों और 17 पर्यवेक्षक राष्ट्रों ने भाग लिया। अमेरिका और इजरायल के विरोध के बावजूद संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उनके अलावा तीन देशों के बादशाह, 24 राष्ट्रपति, 8 प्रधानमंत्री, 50 विदेशमंत्री और 7 हजार प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

जरा गौर करें कि इस सम्मेलन में राष्ट्रों के असली नीति-निर्माता यानी प्रधानमंत्री कितने आए? केवल आठ! बाकी सब वे लोग आए, जिनका अपने-अपने राष्ट्रों के संचालन में या तो महज औपचारिक या दोयम दर्जे का स्थान होता है। उनमें कुछ प्रथम दर्जे के लोग भी थे, जैसे मिस्र के राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी, लेकिन एक तो मिस्र पिछले सम्मेलन का अध्यक्ष था और दूसरे मुर्सी ने सीरिया के मामले में ईरान का स्पष्ट विरोध कर दिया। जो प्रधानमंत्री या प्रथम दर्जे के नीति-निर्माता आए, उन्होंने भी क्या चमत्कार कर दिखाया? कुछ नहीं। एक भी अंतरराष्ट्रीय महत्व का ऐसा मुद्दा उन्होंने नहीं उठाया और ऐसी एक भी नीतिगत घोषणा नहीं की, जिससे दुनिया के हालात कुछ बदलते।

इस समय दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में परमाणु-युद्ध की आशंका, पर्यावरण का क्षरण, राष्ट्रों की आर्थिक असमानता, संयुक्त राष्ट्र संघ की पुनर्रचना आदि हैं। लेकिन इन मुद्दों पर क्या कोई ठोस निर्णय हुए? ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनई ने मांग की कि 2025 तक परमाणु शस्त्रों पर पूर्ण प्रतिबंध का टाइम-टेबल पेश करें, लेकिन सभी राष्ट्रों को सांप सूंघ गया, क्योंकि इस मुद्दे पर कुछ भी घोषणा करने का अर्थ है, शेर के गले में घंटी बांधना।

क्या इन 120 तथाकथित गुट-निरपेक्ष देशों में इतना दम है कि वे अमेरिका और रूस से किसी ठोस पहल की मांग कर सकें? संसार में अगर 20 हजार परमाणु बम हैं तो लगभग 19 हजार सिर्फ अमेरिका और रूस के पास हैं। क्यों नहीं भारत, पाकिस्तान, उ. कोरिया जैसे देश कहते कि वे अपने परमाणु बम पहले नष्ट करेंगे, बशर्ते पांचों परमाणु शक्तियां अपना टाइम-टेबल पेश करें? कागजी संकल्प पारित कर देने से कुछ नहीं होता। गुट-निरपेक्ष सम्मेलनों में इसी तरह के निस्तेज और निष्प्राण प्रस्ताव विश्व के ज्वलंत मुद्दों पर पारित होते रहते हैं।

ईरान ने इस सम्मेलन का आयोजन करते समय बड़े-बड़े ख्याली पुलाव पकाए थे। वह सोच रहा था कि उसकी मेहमाननवाजी का लिहाज करते हुए कम से कम सीरिया, फलस्तीन और ईरान पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों के बारे में गुट-निरपेक्ष सम्मेलन कुछ कड़ा रुख अपनाएगा। लेकिन सम्मेलन द्वारा कोई मनोवांछित प्रस्ताव पारित करवाने में ईरान असफल तो हुआ ही, तेहरान पहुंचे प्रतिनिधियों ने भी उसका समर्थन नहीं किया। हर राष्ट्र ने छोटे-मोटे सभी ज्वलंत मुद्दों पर अपनी राष्ट्रीय विदेश नीति का स्पष्ट अनुगमन किया और ईरान के उकसावे के बावजूद वे अपनी परंपरागत पटरी से टस से मस नहीं हुए। अयातुल्लाह खामेनई ने संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्तमान स्वरूप की कड़ी भत्र्सना की, लेकिन बान की मून ने अपने भाषण में ईरान से अनुरोध किया कि वह सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का सादर पालन करे। खामेनई ने फलस्तीन पर बोलते हुए इजरायलियों को हिंसक भेड़िए कहा, लेकिन भारत जैसे कई राष्ट्रों ने फलस्तीनियों के लिए न्याय की मांग करके अपना कर्तव्य पूरा किया।

इसी प्रकार सीरिया के सवाल पर जब ईरान ने वहां के शासक बशर हाफिज अल-असद का समर्थन किया तो किसी भी राष्ट्र ने उसका अनुमोदन नहीं किया। भारत समेत अनेक राष्ट्रों ने सीरियाई संघर्ष के शांतिपूर्ण और सर्वसमावेशी समाधान की गुहार लगाई। ईरान जिस मामले पर सबसे ज्यादा बिलबिलाया हुआ था, वह था पश्चिम द्वारा उस पर लगाया गया परमाणु बम बनाने का आरोप। इस आरोप को सिरे से खारिज करते हुए ईरानी नेताओं ने यहां तक कह डाला कि परमाणु बम बनाना पाप है, इस्लाम-विरोधी है और वह बम कभी नहीं बनाएगा, तो भी किसी राष्ट्र ने पश्चिमी प्रतिबंधों का स्पष्ट विरोध नहीं किया। सम्मेलन की संयुक्त घोषणा में इस विरोध का कोई जिक्र नहीं है।

पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण ईरान की दाल पतली हो रही है। उसका तेल-निर्यात काफी घट गया है, महंगाई और बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। फिर भी ईरानी नेताओं ने बार-बार गर्जना की कि वे अपनी परमाणु ऊर्जा शक्ति को बढ़ाते चले जाएंगे और उनका यह शांतिपूर्ण कार्यक्रम कैसे भी प्रतिबंधों के डर से रुकेगा नहीं। भारत ने भी बीच का रास्ता पकड़ा। प्रधानमंत्री ने कह दिया कि वे ईरान के शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम को तो उचित समझते हैं, लेकिन उसे परमाणु-अप्रसार संधि के हस्ताक्षरकर्ता के तौर पर उस संधि का निष्ठापूर्वक निर्वाह करना चाहिए, यानी परमाणु बम नहीं बनाना चाहिए। भारत की तरह कई अन्य राष्ट्रों ने भी इस विवाद से कन्नी काट ली।


यही आज के गुट-निरपेक्ष आंदोलन की असलियत है। इसके सदस्यों ने ऐसी पहल क्यों नहीं की कि ईरान के लगभग सभी परमाणु संयंत्र, खासकर नतंज के संयंत्र को सारे प्रतिनिधियों के लिए खोल दिया जाता और इसे देखकर वे पश्चिमी राष्ट्रों से अपने प्रतिबंधों पर पुनर्विचार के लिए कहते, लेकिन तेहरान पहुंचने वाले देश अपना स्वार्थ साधते कि इस पचड़े में पड़ते? दूसरे शब्दों में ‘नाम’ का सम्मेलन सिर्फ ‘नाम’ का रह गया है, लेकिन यह बिल्कुल निर्थक भी नहीं है। निर्थक होता तो ईरान इतनी कड़की के बावजूद सात हजार प्रतिनिधियों का इतना मोटा खर्चा क्यों उठाता? ईरान का यही भला हुआ कि उसने अपनी खरी-खोटी सबको उनके मुंह पर सुना दी। अमेरिका के दोस्त भी तेहरान पहुंचने से झिझके नहीं। भारत जैसे देशों ने भी जमकर फायदा उठाया। तेहरान के साथ चाहबहार की सुविधा चालू करने का अफगान-ईरान-भारत समझौता हुआ, जिसके कारण अब पाकिस्तान पर अफगानिस्तान की निर्भरता काफी कम हो जाएगी। भारत-ईरान द्विपक्षीय संबंध तो घनिष्ट हुए ही; मिस्र, बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के शीर्ष नेताओं से भारत को एक साथ विचार-विमर्श का मौका भी मिला। ‘नाम’ के बहाने सबने अपना-अपना काम साध लिया।

लेखक प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक हैं।
 
 
 

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