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ब्रांड मोदी की व्यापक अपील

राजदीप सरदेसाई | Nov 16, 2012, 01:16AM IST
 
 

चुनावों के बारे में भविष्यवाणी करना पत्रकारों व चुनाव सर्वेक्षकों के लिए खतरनाक हो सकता है, वह भी तब जबकि मतदान एक महीने बाद हो। फिर भी इस राय से तकरीबन सभी सहमत हैं कि नरेंद्र मोदी गुजरात में जीत की हैट्रिक जमाने जा रहे हैं।
 
सीएनएन आईबीएन-द वीक-सीएसडीएस द्वारा एक पखवाड़े पूर्व किए गए सर्वे के मुताबिक गुजरात में मोदी दो-तिहाई बहुमत हासिल कर सकते हैं। मोदी के खेमे के लोग बेशक इसे पूरी तरह गुजरात के मुख्यमंत्री के करिश्मे और उपलब्धियों की जीत बताएंगे। वहीं उनके आलोचक राज्य के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को इसकी वजह ठहराएंगे। वास्तव में सच्चाई इन दोनों के बीच कहीं निहित है।  
 
हां, गुजरात देश का पहला ऐसा राज्य है, जिसे भाजपा के वर्चस्व वाला राज्य कहा जा सकता है। आगामी दिसंबर में भाजपा लगातार पांचवीं बार अपनी जीत का परचम फहरा सकती है। यानी गुजरात ऐसा ‘भगवा दुर्ग’ बन गया है, जैसे कभी पश्चिम बंगाल ‘लाल किला’ या महाराष्ट्र ‘कांग्रेसी गढ़’ हुआ करता था। इस राज्य में 58 सीटें ऐसी हैं, जिन पर भाजपा पिछले चार चुनावों में कभी नहीं हारी। 
 
हां, 2002 के दंगों ने भले ही तथाकथित हिंदू वोट बैंक के प्रभुत्व की पुष्टि की हो, लेकिन तथ्य यह है कि ये वोट बैंक हिंसा उपजने से पहले के दौर में उभर चुका था। मसलन वर्ष 1995 में भाजपा ने 50 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल किए, जो इस बात का सबूत है कि नब्बे के दशक में यह पार्टी तेजी से उभरी और पिछले दस वर्षो में इसने सिर्फ अपने इस वोट बैंक को और मजबूत ही किया है। अयोध्या आंदोलन के बाद से गुजरात हिंदुत्व की राजनीति की प्रयोगशाला रहा है और भाजपा के उत्कर्ष की शुरुआत उस निर्णायक दौर में हुई, जिस दौर में धर्म और राजनीति का खतरनाक घालमेल तैयार हुआ। 
 
इसके साथ-साथ यह भी उतना ही सच है कि गुजरात के ‘विकास’ का एजेंडा 2002 में मोदी के आरोहण के साथ शुरू नहीं हुआ, जैसा कि उनकी चालाक मार्केटिंग मशीनरी हमें यकीन दिलाना चाहती है। वहां मोरारजी देसाई से लेकर चिमनभाई पटेल और माधव सिंह सोलंकी तक अनेक ऐसे मुख्यमंत्री रहे, जिन्होंने आर्थिक विकास को लेकर हमेशा सुदृढ़, अग्रगामी नजरिया अपनाया।
 
इस प्रदेश की अनेक सड़क, सिंचाई तथा तेल व गैस खनन परियोजनाएं मोदी के पूर्ववर्ती दौर में शुरू हुईं। मोदी ने गुजरात की उद्यमी ऊर्जाओं के दोहन के लिहाज से बेहतरीन काम किया और खासकर पावर सेक्टर के बारे में उनकी नीतियां नवोन्मेषी व सफल रही हैं। लेकिन यह कहना कि मोदी के जोश  के बगैर गुजरात समृद्ध नहीं होता, गुजरातियों के समयसिद्ध कारोबारी कौशल को नजरअंदाज करना है।
 
आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97) के दौरान गुजरात की औसत विकास दर 12.9 फीसदी थी। अब इसका पिछले पांच सालों में 11.2 फीसदी के आसपास होने का अनुमान है। 
 
इसके साथ-साथ पिछले दस वर्षो के दौरान भाजपा के लगातार बढ़ते दबदबे के पीछे मोदी के व्यक्तिगत योगदान को खारिज करना भी आसान नहीं होगा। इसमें शायद ही किसी को संदेह हो कि पहले ‘हिंदू हृदय सम्राट’ और फिर ‘विकास पुरुष’ के तौर पर मोदी की छवि ने भाजपा के स्वाभाविक मतदाता वर्ग को बढ़ाने में मदद की। उनकी नेतृत्व शैली भले ही अधिनायकवादी, यहां तक कि विभाजनकारी हो, लेकिन इसकी जो अपील है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
 
आप मोदी के साथ सड़क पर निकलें तो आपको पता चलेगा कि महिलाओं व युवा वर्ग के बीच वह किस कदर लोकप्रिय हैं। इन दोनों समूहों (महिलाएं व युवा) को गुजरात के मुख्यमंत्री में एक खास तरह का मर्दाना आकर्षण नजर आता है। उन्हें भरोसा है कि मोदी ऐसे हीरो हैं, जो अकेले दम पर गुजराती ‘अस्मिता’ या ‘गौरव’ के तमाम दुश्मनों से लोहा ले सकते हैं (पिछले चुनाव में उनके द्वारा की गई ‘छप्पन इंच की छाती’ जैसी टिप्पणी को याद करें)। ऐसे राज्य में जहां राजनेता अमूमन मृदुभाषी और नरम हों तथा जहां पर कांग्रेस के पास कोई भरोसेमंद क्षेत्रीय ‘चेहरा’ न हो, वहां मोदी संवाद की अपनी आक्रामक सीईओ टाइप शैली के साथ अंगद के पैर की तरह जमे हुए हैं। 
 
यह कहना उचित होगा कि गुजरात में आबादी की बदलती व्यवस्था के हिसाब से ब्रांड मोदी ज्यादा मुफीद बैठता है। 42 फीसदी शहरी आबादी के साथ गुजरात तमिलनाडु और महाराष्ट्र के बाद शहरीकरण के लिहाज से तीसरा बड़ा राज्य है। वहां हाईवे के इर्द-गिर्द हर 30 किलोमीटर पर टाउनशिप मौजूद है। किसी भी अन्य राज्य में नए शहरी मध्यम वर्ग का उभार इतना प्रत्यक्ष नहीं है, जितना कि गुजरात की बाजार-संचालित अर्थव्यवस्था में नजर आता है। यह दिल से धार्मिक तथा दिमाग से उपभोक्तावादी शहरी मतदाता वर्ग ही है, जो गुजरात में भगवा लहर के पीछे प्रमुख संचालक शक्ति रहा है। पिछले दो दशक में भाजपा ने स्थिर सरकार, आर्थिक आजादी और हां, मुस्लिमों को ‘बाहरी’ की तरह देखने वाली खुली धार्मिकता पेश करते हुए शहरी व अर्धशहरी गुजरात की राजनीति पर अपना दबदबा बरकरार रखा है। 
 
मोदी अपनी निर्णायक, व्यावहारिक नेतृत्व शैली के साथ तेजी से विकास पथ पर अग्रसर इस नवीन गुजरात के प्रतीक हैं। सुशासन पर जोर और बाजार-हितैषी नीतियों के ट्रैक रिकॉर्ड के साथ मोदी उन लोगों को अपील करते हैं, जो मानते हैं कि राज्य को उच्च विकास दर हासिल करने में सहूलियत देने वाले की भूमिका में होना चाहिए। मिसाल के तौर पर बंगाल जैसे प्रदेशों में गूंजने वाले भू-अधिग्रहण संबंधी विवाद गुजराती भूस्वामियों के लिहाज से ज्यादा प्रासंगिक नजर नहीं आते, जो अपनी प्रॉपर्टी के लिए सर्वश्रेष्ठ डील करना चाहते हैं। 
 
लिहाजा, गुजरात में मोदी की जीत पर दांव लगाना सुरक्षित लगता है। हालांकि यह सवाल अब भी अपनी जगह कायम है कि क्या गुजरात इस जटिल, विविधतापूर्ण भारत में लोकप्रियता मापने का बेंचमार्क हो सकता है? 
 
राजदीप सरदेसाई
 
आईबीएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ    
 
 
 
 

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