विज्ञापन
 
Home >> Abhivyakti >> Hamare Columnists >> Ved Pratap Vaidik >> Narendra Modi Has Triumphed

प्रधानमंत्री के द्वार पर मोदी की दस्तक

वेदप्रताप वैदिक | Dec 20, 2012, 23:19PM IST
 
 

भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि कोई मुख्यमंत्री अपने प्रांत में जीते तो उस जीत को प्रधानमंत्री पद के द्वार की दस्तक माना जाए। यूं तो प्रधानमंत्री बनने के पहले विश्वनाथ प्रताप सिंह और एचडी देवेगौड़ा मुख्यमंत्री रह चुके थे, लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनने और मुख्यमंत्री होने का कोई सीधा संबंध नहीं था।
 
मगर सारा देश सांस रोककर यह जानना चाह रहा था कि गुजरात के चुनाव में क्या होने वाला है? किसी एक प्रांत का चुनाव सारे देश के लिए इतना महत्वपूर्ण कभी नहीं बना। यही तथ्य यह सिद्ध करता है कि अब गुजरात भारत की चाबी बन गया है। 
 
यद्यपि नरेंद्र मोदी ने यह दावा कभी नहीं किया कि वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। लेकिन देश आज जिस तरह से पक रहा है, वह अपने आप ही उनकी झोली में टूट पड़ेगा। आज देश कैसे प्रधानमंत्री की प्रतीक्षा कर रहा है? एक ऐसे प्रधानमंत्री की, जो कठपुतली की तरह नहीं, बल्कि एक दबंग नेता की तरह पेश आए। जो अपने भ्रष्टाचारी साथियों और अफसरों का काल बन जाए। जो स्वयं सिर्फ स्वच्छ ही न हो, बल्कि यह भी देखे कि उसकी सरकार और पार्टी पर भी कोई उंगली न उठा सके। आज देश में सरकार का दबदबा बिलकुल डबडबा गया है। लोग मोम-पुरुष की जगह लौह-पुरुष की प्रतीक्षा कर रहे हैं। लगभग सभी राजनीतिक दलों ने देश में नेतृत्व का शून्य पैदा कर दिया है। इस शून्य को कौन भरेगा? इस प्रश्न का जवाब गुजरात के चुनाव ने दे दिया है। 
 
मोदी को इस चुनाव में डेढ़ सौ सीटें नहीं मिलीं तो क्या हुआ? उन्हें जितनी सीटें भी मिलीं, वे वास्तव में डेढ़ सौ से भी ज्यादा हैं। क्या पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल का अडं़गा कोई छोटा-मोटा अडं़गा था? ‘रावण’ की लंका जलाने के लिए कोई विभीषण तो बन गया, लेकिन सोने की लंका ज्यों की त्यों है और विभीषण का अंत रावण की तरह हो गया। इतना ही नहीं, माना तो यह जा रहा है कि संघ और भाजपा के भी कई खुर्राट दिग्गज इस विभीषण सेना के साथ हो चले थे। यदि यह सत्य है तो मानना पड़ेगा कि यह चुनाव मोदी ने अपने बूते जीता है। इस अर्थ में वे स्वायत्त हो गए हैं।
 
संघ और भाजपा में वे हैं, लेकिन उनमें रहते हुए वे उनसे आगे निकल गए हैं। उन्होंने उन प्रचारशास्त्रियों को भी गुजराती चटनी चटा दी है, जो पानी पी-पीकर उनको कोसते थे। उन्होंने इस चुनाव में गुजराती राजनीति का मुहावरा ही बदल दिया है। उन्होंने हिंदुत्व की जगह विकास को प्रतिष्ठित कर दिया। जो निंदकगण हिंदुत्व का नगाड़ा पीटते रहे, वे विदूषक सिद्ध हो गए। उनकी सुई दस साल पुराने रिकॉर्ड में अटकी रही। मोदी आगे निकल गए। मोदी ने जिस मुद्दे पर फतह पाई है, वह 21वीं सदी के भारत का मुद्दा है। 
 
कांग्रेस बेहद खुश है कि उसने अपनी सीटें नहीं खोईं। यह खुशी भी क्या खुशी है? इस खुशी का कारण भी अगर केशुभाई और उनके संघी व भाजपाई साथी ही हैं तो धन्य है यह कांग्रेस! जिस रफ्तार से पिछले तीन चुनावों में कांग्रेस ने अपनी सीटें बढ़ाई हैं, उसी रफ्तार से उसकी प्रगति होती रही तो वह गुजरात में अगले तीस साल के बाद ही सरकार बना पाएगी।
 
जिस यथास्थिति पर कांग्रेस संतोष प्रकट कर रही है, वह स्थिति तो नहीं, दुर्दशा है। पार्टी के अध्यक्ष, संसदीय दल के नेता और अन्य महत्वपूर्ण पदाधिकारी ही नहीं, कुछ महिलाएं, जिन्हें उकसाकर खड़ा किया गया था, वे भी हार गईं। गुजरात के मतदाता न तो जातिवाद के चक्कर में फंसे, न उन्होंने क्षेत्रवाद को तरजीह दी और न ही वे सांप्रदायिक प्रचार के शिकार बने।
 
नरेंद्र मोदी के विरुद्ध गड़े मुर्दे उखाड़ने वाले लोग अभी भी उसी काम में लगे हैं, जो वे दस साल पहले कर रहे थे। उनका मानना है कि मोदी की जीत लोकतंत्र की अवहेलना है, संविधान का अपमान है, बर्बरता की विजय है। वे भूल गए कि इस बार गुजरात की जनता ने अपूर्व संख्या में मतदान किया।
 
यदि मोदी की नीतियां जन-विरोधी होतीं तो नए युवा और महिला मतदाता उन्हें हरा देते। लेकिन मोदी की जीत यह सिद्ध कर रही है कि पिछले दस साल में पैदा हुए नए मतदाता भी उनके साथ हैं। सब मतदाता यह भी देख रहे थे कि जिस मोदी को हमारे कुछ नेता, अखबार और टीवी चैनल रावण के रंग से पोतना चाह रहे थे, उसी मोदी को अमेरिकी पत्रिका ‘टाइम’ हीरो बता रही थी, उसी मोदी से मिलने के लिए विदेशी राजदूतों की कतार लगी हुई थी, उसी मोदी के गुजरात में हमारे श्रेष्ठ उद्योगपति और फिल्मी सितारे दौड़े चले जा रहे थे। वास्तव में मोदी गुजराती उप-राष्ट्रवाद के प्रतीक बन गए थे। अब भी मोदी अपने धन्यवाद-भाषण में गुजरात और गुजरात की ही बात करते रहे। वे प्रधानमंत्री पद की तरफ देखते हुए भी दिखाई नहीं पड़ना चाहते। 
 
नरेंद्र मोदी 10 वर्ष तक सफल मुख्यमंत्री रहे हैं। वे देश के श्रेष्ठ प्रधानमंत्री सिद्ध हो सकते हैं, लेकिन उनका मार्ग सरल नहीं है। उनका मार्ग कंटकों से भरा है। सबसे पहले उन्हें अपनी पार्टी भाजपा की अनुकूलता प्राप्त करनी होगी। भाजपा में आधा दर्जन से भी अधिक लोग प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। इसके अलावा भाजपा-गठबंधन की साथी पार्टियों को भी पटाना जरूरी है। इनसे भी ज्यादा जरूरी है, गुजरात के बाहर भी अपनी लोकप्रियता तैयार करना। यदि भारत में भी मोदी गुजरात देखना चाहते हैं, तो उन्हें खुद से पूछना होगा कि क्या वे अटल बिहारी वाजपेयी बन सकते हैं? कांग्रेस से लड़ना आसान है, लेकिन खुद से लड़ना कठिन! खुद के स्वभाव पर विजय पाना और ऐसी विजय पाना, जिस पर दूसरे भी भरोसा कर सकें, तो मोदी को अपनी मंजिल पर पहुंचने से कौन रोक सकता है?
 
वेदप्रताप वैदिक 
 
प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक      
 
 

आपके विचार
 
 
कोड:
2 + 6

 
Ad Link
विज्ञापन
विज्ञापन
 
 
 
 
Sabse Bada Match Fixer Contest
 
 

बड़ी खबरें

रोचक खबरें

विज्ञापन

बॉलीवुड

जीवन मंत्र

क्रिकेट

बिज़नेस

जोक्स

पसंदीदा खबरें

Email Print Comment
Email Print Comment