खत्म होने के बाद भी 2012 का जयपुर साहित्य समारोह अभिव्यक्ति की आजादी, कट्टरपंथिता और सेंसरशिप जैसे मुद्दों से जुड़कर सुर्खियां बना रहा है। वजह है भारी पब्लिसिटी के बाद विवादों से घिरे सलमान रुश्दी का इसमें न आना, प्रतिबंधित किताब के अंशों का चार लेखकों द्वारा सार्वजनिक पाठ, फिर (अदालती कार्रवाई के डर से) आयोजकों द्वारा उनको रुखसत करना और समारोह के आखिरी दिन न्यूयॉर्क में बैठे रुश्दी से प्रस्तावित वीडियो कांफ्रेंसिंग भी रद्द किए जाने को लेकर उठे विवाद।
सरकार का कहना है कि रुश्दी भारतीय मूल के अनिवासी भारतीय हैं और जब चाहें भारत आने को आजाद हैं। 2007 में भी तो इस समारोह में वे आए थे। इस बार भी रुश्दी को न आने या उनकी कथा का पारायण करने वाले अनिवासी भारतीय लेखकों को वापस जाने का कोई सरकारी आदेश नहीं दिया गया।
हर तरह की लेखकीय अभिव्यक्ति के हक को बचाने की मुहिम में अब सैकड़ों यायावर पंछी दुनियाभर में सोशल साइट्स पर ट्वीट कर रहे हैं कि भारत सरकार ने रुश्दी या कथा पारायण करने वाले चार दरवेशों को यथासमय पूरी सुरक्षा का पक्का आश्वासन क्यों नहीं दिया? पर 9/11 के बाद दुनिया में बनी हिंसक धड़ेबंदी और धार्मिक उन्माद के माहौल में भारत ही नहीं, बड़ी मुस्लिम आबादी वाला कोई भी लोकतंत्र ‘शैतानी आयतें’ जैसी किताब लिखकर ‘आ बैल मुझे मार’ कहने वाले रुश्दी को यह आश्वासन नहीं दे सकता।
लोकशाही लाने को सड़कों पर जमा होकर तानाशाहों को उखाड़ फेंकने वाले मिस्र या लीबिया भी नहीं। महत्वपूर्ण असेंबली चुनावों के वक्त जब 18 फीसदी मुस्लिम वोटों को कोई राजनीतिक दल खुल्लमखुल्ला रुसवा नहीं कर सकता, किसी भी सरकार से यह मांग करना कि वह हार का जोखिम उठाकर भी रुश्दी के लिए लाल कालीन बिछा दे, बेअक्ली है।
यह अप्रिय सचाई रेखांकित करना इसलिए जरूरी है कि साहित्य जगत के सूरमा चाहे जो कहें, फिलवक्त भारतीय लोकतंत्र के लिए रुश्दी की ठकुरसुहाती जीने-मरने का विषय नहीं है। आने वाले समय में हमारे सामने कई असली सिरदर्द हैं। पहले सिरदर्द का स्रोत राजकाज में हुए भयावह घोटाले हैं, जिन पर फिलवक्त चुनावी माहौल में चर्चा स्थगित है।
बजट सत्र में यह मुद्दा फिर उभरेगा। दूसरे सिरदर्द की घंटी अन्ना हजारे बजा रहे हैं। उन्होंने संप्रग, भाजपा, वाम दलों तथा सपा-बसपा से जनलोकपाल के संदर्भ में अपनी मंशा साफ करने के लिए तीखेपन से जवाब-तलब किए हैं। दक्षिण में कर्नाटक और तेलंगाना के पतीले भी खदबदा रहे हैं और उत्तर-पूर्वी तट पर नक्सली लगातार बारूदी सुरंगें बिछा रहे हैं।
बाहरी हाल यह है कि पाकिस्तान जीवन रक्षक उपकरणों पर है, यूरो जोन की अर्थव्यवस्था दम तोड़ रही है और अमेरिका साल के अंत तक में होने जा रहे घरेलू चुनाव के दबाव तले दीर्घकालिक नीतियों पर काम नहीं कर सकता। यदि ये तमाम अंधड़ अगले महीनों में एक साथ विमोचित हुए तो उनसे झिंझोड़ा गया वर्ष 2012 भारत के लिए भी एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है और इन आगामी अंधड़ों से हर मुख्यमंत्री, हर गठजोड़ के नेता को जूझना ही पड़ेगा।
अत: सफल होने की राह में सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि ‘सेटैनिक वर्सेज’ के आयात पर लगाया प्रतिबंध हटे या नहीं (इंटरनेट ने उसे यूं भी बेमतलब बना दिया है), बल्कि यह कि पार्टियां किस हद तक हर राज्य में मौजूद भिन्न हित स्वार्थो वाले अनगिनत समुदायों के बीच समन्वय स्थापित करते हुए उनको अपना बना पाती हैं, कि चुनावी जीत के बाद भी 2014 की मध्यावधि में मीडियाई अपयश के नर्क से निपटने का कितना माद्दा उनमें है।
भारत का गणतंत्र अगर पिछले तिरसठ सालों से कायम है तो इसलिए कि उसके कायम रहने में बहुसंख्यकों ही नहीं, अल्पसंख्यकों और हाशिये के अनेक समुदायों को भी अपनी आकांक्षाओं और हित स्वार्थो के पूरे होने की संभावना बढ़ती नजर आ रही है। सात समंदर पार न्यूयॉर्क या लंदन के साहित्यिक प्रतिष्ठानों की अनमनी तालियां बटोरने को जानबूझकर इन घरेलू सचाइयों की उपेक्षा कोई सरकारी तंत्र नहीं करेगा।
सरकार की काफी निंदा हो चुकी है और होती रहेगी, लेकिन यह तय है कि अगर चुनावी तनाव के बीच कोई गुट या एकल सिरफिरा जयपुर में रुश्दी का रोआं छूकर कश्मीर से केरल तक दंगा फैला देता तो उस सांप्रदायिक टकराव का सारा अपयश भी सरकार के ही मत्थे डाला जाना था। ‘गदहा मरे कुम्हार का औ’ धोबन सत्ती होय’, की तर्ज पर रुश्दी के पक्ष में जो कतिपय हिंदी लेखक गरज रहे हैं, उनको हमारी राय है कि वे भी तनिक रुककर याद कर लें कि अनेक मंचों पर व्यक्त रुश्दी की राय में भारत का भाषायी साहित्य निपट देहाती, अपठनीय और अंग्रेजी लेखन की तुलना में धूरि समान है।
इस बार हाई ब्रो रुश्दी आते भी तो क्या वे हमारे वर्नाकुलर लेखकों से कोई सदय विनम्र संवाद करते? चहकती चिड़ियों या गुर्राते शेर की तरह अपने ट्वीट्स के मार्फत वे और थायिल, अमितावा, रुचिर या कुंजरू महोदय सरीखे अपने भाषायी बिरादरों, अनिवासी भारतीयों तथा परदेसी लेखकीय समूह को ‘हम विस्थापित लोग’ विषय पर एक पारंपरिक सामूहिक उड़ान एडवेंचर या नृत्य के लिए न्योत रहे हैं, जो किसी अगले साहित्य फेस्ट में नाचा जाना है। उनके असली पाठक, प्रिय समालोचक, एजेंट, प्रकाशक सब उस गोलार्ध में ही बसते हैं, जहां वे खुद जा बसे हैं।
बहरहाल ‘कारण कवन नाथ मोहि मारा’ नुमा रुश्दी की ट्वीट पढ़ते हुए हमको बहुत पहले पढ़ी एक रूसी नीति कथा याद आ गई। जाड़े की एक शाम को घर लौट रहे एक किसान ने देखा कि पाले से अकड़ा एक कबूतर जमीन पर तड़प रहा है। दयालु किसान ने उसे उठाकर कोट में लपेट लिया और धीरे-धीरे सहलाकर उसकी रुकती सांसों को लौटाया। जब कबूतर ने आंखें खोलीं, तभी वहां से गायों का एक रेवड़ गुजरा।
एक गाय ने तनिक रुककर किसान के आगे गोबर का बड़ा ढेर लगा दिया। किसान ने कबूतर को तुरंत उस गर्मागर्म गोबर की ढेरी में रोप दिया और राहत की सांस ली कि अब सुबह धूप निकलने तक बेचारा पक्षी बर्फीली हवा से बचा रहेगा। किसान तो चला गया पर गोबर की गर्मी से त्राण महसूस करते कबूतर ने जोरों से गुटरगूं शुरू कर दी। अंधेरे में उसकी जोरदार चहक सुनकर पास से गुजरता दूसरा किसान रुका और कबूतर को पका खाने के लिए उठा ले गया।
कहानी तीन नसीहतें देती है। एक : गोबर में डालने वाला हर जीव दुश्मन नहीं होता। दो : गोबर से बाहर निकालने वाला हर जीव दोस्त नहीं होता। और तीन : गोबर में आकंठ डूबा बंदा ज्यादा चहकने से बाज आए। - लेखिका जानी-मानी साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं।