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राष्ट्र भाषा होती है राष्ट्र की रीढ़

bhaskar news | Sep 14, 2013, 02:46AM IST

बाइबिल में एक अत्यंत प्रेरणास्पद कहानी आती है। किसी नगर के राजा ने अपनी राजधानी में एक सुंदर मीनार बनवाने का निश्चय किया। उसकी यह इच्छा थी कि मीनार पर भले ही खूब धन खर्च हो जाए, किंतु वह ऐसी शानदार बने कि उसकी चर्चा सारी दुनिया में हो। उसे देखने के लिए विदेशों तक से लोग आएं। राजा को स्थानीय कारीगरों से यह उम्मीद नहीं थी कि वे ऐसी उम्दा मीनार बना पाएंगे। इसलिए उसने अलग-अलग देशों के उत्कृष्ट कारीगरों को बुलाया। जब वे सभी आ गए तो राजा ने एक दिन मीनार के स्थान का भूमिपूजन करवाया।


अगले दिन से काम शुरू हुआ, लेकिन शीघ्र ही एक बहुत बड़ी कठिनाई आ गई। बाहर से आए कारीगर अलग-अलग देशों के थे इसलिए वे एक-दूसरे की भाषा नहीं समझते थे। परिणाम यह हुआ कि कारीगर जब ईंट मांगता तो मजदूर मसाला देता था और जब कारीगर मसाला मांगता तो मजदूर ईंट पहुंचा देता। ऐसा काफी समय तक चलता रहा। राजा भी इस बात से बहुत परेशान हुआ।


इस असामंजस्य के कारण मीनार नहीं बन सकी और राजा ने सभी कारीगरों को धन्यवाद सहित उनके देश लौटा दिया। बाइबिल की यह कहानी प्रतीकात्मक है। यहां संकेत यह है कि जब भाषा के अभाव में एक मीनार नहीं बन सकी तो बिना राष्ट्रभाषा के किसी राष्ट्र का निर्माण कैसे संभव है? हम सभी को इस तथ्य को समझ लेना चाहिए कि राष्ट्रभाषा किसी राष्ट्र की रीढ़ होती है। इसलिए हिंदी के अधिकाधिक उपयोग के द्वारा हमें भारत को एकता की डोर में बांधकर उसके विकास को सुनिश्चित करना चाहिए।
 

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