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दवाओं के मूल्य नियंत्रण का मुद्दा

Bhaskar News | Oct 05, 2012, 03:28AM IST
 
 

जरूरी दवाओं की कीमत नियंत्रित करने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद अहम दखल दिया है। हफ्तेभर पहले ही केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची का विस्तार कर उसमें 348 दवाओं को शामिल करने का निर्णय लिया था। लेकिन इन दवाओं की कीमत तय करने का सरकार ने जो फॉमरूला तैयार किया, कोर्ट उससे संतुष्ट नहीं है, बल्कि उसे आशंका है कि अगर नया फॉमरूला अपनाया गया तो जीवनरक्षक दवाएं और महंगी हो सकती हैं।

अभी आवश्यक औषधि सूची में 74 दवाएं हैं, जिनकी कीमत उन्हें बनाने की लागत के आधार पर तय होती हैं। लेकिन अब केंद्र इस सूची में रखी जाने वाली दवाओं की कीमत बाजार में मौजूद संबंधित दवा के विभिन्न ब्रांडों की कीमत के औसत के आधार पर तय करना चाहता है।

सिविल सोसायटी के संगठनों का आरोप है कि नया फॉमरूला असल में दवाओं के मूल्य नियंत्रण की प्रणाली को कमजोर कर देगा। यानी यह मूल्य नियंत्रण लागू करने के नाम पर असल में अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की दवा कंपनियों की प्रवृत्ति को संस्थागत रूप दे देगा। सर्वोच्च न्यायालय ने इस दलील को ठोस मानते हुए सरकार से कहा है कि वह मूल्य तय करने की प्रणाली में परिवर्तन न करे। साथ ही यह बताए कि नई दवाओं को कब से नियंत्रित मूल्य वाली औषधियों की सूची में लाया जाएगा।

कोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद अब दवा मूल्य नियंत्रण के प्रश्न पर सरकार को नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है। बेहतर होगा सरकार इस सवाल को न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र का मुद्दा न बनाए। संभवत: इसी संभावना को ध्यान में रखकर खंडपीठ ने ताजा आदेश देते समय यह टिप्पणी की कि कोर्ट सरकार नहीं चलाता, लेकिन जहां नाकामियां नजर आती हैं, उसे सीमा तय करनी पड़ती है। दवा मूल्य नियंत्रण का मसला अगर नौ साल से लटका हुआ है, तो यह कोर्ट का दोष नहीं है।

इसलिए बेहतर होगा कि सरकार न्यायालय की मूल भावना के मुताबिक कदम उठाए, बल्कि जिस समय सरकार बारहवीं पंचवर्षीय योजना में सबको स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का एलान कर रही है, कोर्ट की ये भावनाएं उसकी मार्गदर्शक बन सकती हैं। बात पते की
 
 
 

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