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मन पर काबू पाने के लिए अभ्यास जरूरी

पं. विजयशंकर मेहता | Dec 11, 2012, 05:44AM IST
दुर्गुणों  का प्रमुख केंद्र मन होता है और यदि मन पर नियंत्रण पाना है तो सतत अभ्यास और वैराग्य जरूरी है। सुंदरकांड में जैसे-जसे रामजी लंका की ओर बढ़ते हैं, घटनाओं के अद्भुत संकेत आने लगते हैं। यह कांड दो भागों में बंटा है।
 
60 दोहों में से प्रथम 33 दोहों में हनुमानजी की लीला है और फिर हनुमानजी मौन हो गए। बाद के 27 दोहों में श्रीराम का चरित्र है। लेकिन सारी घटनाएं वैसी ही हो रही हैं, जैसी हनुमानजी चाहते थे। आत्मसंयमी व्यक्तियों के संकल्प इसी प्रकार पूरे होते हैं।
 
श्रीराम का लंका की ओर बढ़ने का अर्थ है दुर्गुणों के विनाश की तैयारी। हमारे जीवन में  भी ऐसा ही घटता है। जब हम अपने दुगरुणों को मिटाने के लिए परमात्मा का सहारा लेते हैं तो दो बातें होती हैं। जैसी कि उस समय लंका में हो रही थीं। पहली तो यह कि लंका दहन की चर्चा राक्षस भयभीत होकर कर रहे थे। यह वैराग्य की घटना है।
 
लंका के भोग-विलास वाले वातावरण में हनुमानजी ने वैराग्य के माध्यम से ही उसे जलाया था। आज भी हम ऐसे ही वातावरण में जी रहे हैं। सेना का समुद्र तट पर पहुंचने का अर्थ है-अभ्यास, सतत परिश्रम। इसीलिए तुलसीदासजीने लिखा- उहां निसाचर रहहिं संसका। जब तें जारि गयउ कपि लंका।। निज निज गृहं सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।
 
यानी जबसे हनुमानजी लंका को जलाकर गए हैं, तब से राक्षस भयभीत रहने लगे। अपने-अपने घरों में सब विचार करते हैं कि अब राक्षसकुल की रक्षा का कोई उपाय नहीं है। दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।। यानी दूतियों से नगर निवासियों के वचन सुनकर मंदोदरी बहुत ही व्याकुल हो गई।
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