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लापरवाही और घाटे की उड़ान

 
Source: चेतन भगत   |   Last Updated 00:16(17/11/11)
 
 
 
 
यह विडंबना ही है कि मैं यह कॉलम किंगफिशर की दिल्ली-बेंगलुरू फ्लाइट से लिख रहा हूं। एक खूबसूरत फ्लाइट अटेंडेंट ने मुझे सफेद कटलरी पर टोमैटो-मोज्जारेला सैंडविच सर्व की है। उसकी मुस्कराहट देखकर यह अनुमान लगा पाना कठिन है कि उसकी एयरलाइन इन दिनों एक मुश्किल दौर से गुजर रही है। पता नहीं वह यह जानती है या नहीं कि उसकी कंपनी ने पिछले साल एक हजार करोड़ रुपयों का घाटा उठाया है और उस पर सात हजार करोड़ से अधिक का कर्ज है। ये सिर चकरा देने वाले आंकड़े हैं।

यकीनन, यह रातोंरात नहीं हुआ होगा। तो फिर क्या कारण रहे होंगे? आखिर किंगफिशर ऐसी स्थिति तक कैसे पहुंच गया कि कैश पेमेंट के बिना केटर्स उसकी फ्लाइट पर सैंडविच अपलोड नहीं करते और हवाई अड्डे उन्हें उड़ान भरने की हरी झंडी नहीं देते? जब घाटे और कर्ज की स्थिति इतनी गंभीर नहीं थी, क्या तब कंपनी के साझेदारों ने कोई चिंता नहीं जताई थी? क्या वजह है कि पानी सिर के ऊपर चले जाने तक कोई कुछ नहीं बोला?

वित्तीय विश्लेषक इससे सहमत होंगे कि एयरलाइन सेक्टर मुनाफा कमाने के लिए सबसे कठिन क्षेत्रों में से है और उसमें रिटर्न की स्थिति तो और बदतर है। इस व्यवसाय के लिए सबसे पहले तो बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश की दरकार होती है, फिर कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है और एयरलाइंस के उपभोक्ता भी मूल्यों को लेकर बहुत संवेदनशील होते हैं।

ये बिंदु भारतीय एयरलाइन सेक्टर को तो और ज्यादा प्रभावित करते हैं, क्योंकि यहां ब्याज दरें बहुत ऊंची हैं, उपभोक्ता बेहद मूल्य संवेदी हैं और सरकारी नियम-कायदे और कर नीतियां मुश्किलों को और बढ़ा देती हैं। लेकिन इसके बावजूद कई उद्यमी अपनी स्वयं की एयरलाइन चाहते हैं। भला क्यों?

वजह साफ है। बहुत कम व्यवसाय एयरलाइन जितने आकर्षक हैं। आप किसी फर्टिलाइजर मैनुफेक्चरर या पैकेजिंग प्लांट संचालक या कपड़ा निर्यातक के रूप में सैकड़ों करोड़ कमा सकते हैं, लेकिन एक स्तर पर ये व्यवसाय नीरस हैं। अपनी एयरलाइन होने के रोमांच की तुलना इनसे नहीं की जा सकती।

यदि आपके पास किसी दूरस्थ कस्बे में तीस एकड़ में फैला इंडस्ट्रियल प्लांट है तो इसकी किसे परवाह होगी? लेकिन यदि आपके पास एक दर्जन उड़नखटोले हैं (यकीनन, कर्ज के पैसे पर) तो आपका जो रुतबा होगा, उस बारे में कुछ न पूछिए।

खूबसूरत पायलट, सुंदर फ्लाइट अटेंडेंट्स, फ्लाइट शेड्यूल की गहमागहमियां और रोमांचक उड़ानें, ये सभी धरती से ३क् हजार फीट ऊंचाई के इस व्यवसाय को बेहद आकर्षक बना देते हैं। और इसीलिए हर कोई इसका एक अंग बनना चाहता है। सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकें एयरलाइनों को हजारों करोड़ रुपए देने को हमेशा तत्पर रहती हैं।

हमारे नेता और बाबू भी एयरलाइनों में दिलचस्पी लेते हैं। यदि एयरलाइन जैसे किसी रोमांचक उद्यम का एक हिस्सा बना जा सकता है तो आखिर कोई क्यों किसी सिंचाई परियोजना के लिए काम करना चाहेगा? यह अकारण नहीं है कि घाटे में रहने वाली एयर इंडिया अपना अस्तित्व बचाए हुए है।

एयरलाइन उद्योग को ग्लैमर उद्योग की तरह देखा जाता है, जबकि हकीकत इसके ठीक उलट है। एयरलाइन उद्योग खर्चो में कटौती के लिए एक नीरस और अंतहीन संघर्ष का उद्यम है, जिसे हर हाल में अपने शेड्यूल का पालन करना होता है और अपने विमानों को व्यस्त रखना पड़ता है। यह किसी लॉजिस्टिक, कोरियर या अन्य ट्रांसपोर्टेशन कंपनी से ज्यादा भिन्न नहीं है।

दुनिया की अधिकांश लाभ कमाने वाली एयरलाइन वास्तव में वे हैं, जो अपने खर्चो में कटौती करने का प्रयास करती हैं। जो कंपनी जितनी ज्यादा कॉस्ट कटिंग कर पाती है, वह अपने टिकटों की कीमत उतनी ही कम रख पाती है, ताकि ज्यादा से ज्यादा सीटें भरी जा सकें। भारत में इंडिगो यही करती है और हमारी कठोर कर नीतियों के बावजूद मुनाफा कमाती है।

दुनिया में कुछ लग्जरी एयरलाइंस भी हैं, लेकिन वे एक ऐसे धनाढ्य बाजार को सेवाएं देती हैं, जिसमें सीनियर बिजनेस ट्रेवलर्स की बड़ी तादाद है। वे ऐसे शहरों में भी अपनी सेवाएं देती हैं, जो ग्लोबल बिजनेस हब हैं (जैसे सिंगापुर में एसआईए, हांगकांग में कैथे पेसिफिक और दुबई में एमिरेट्स)। लेकिन इन एयरलाइंस में भी इकोनॉमी क्लास होती है।

किंगफिशर का बिजनेस मॉडल प्रारंभ से ही दोषपूर्ण था। मूल्य दरों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील उद्योग में विलासिता और तड़क-भड़क पर जोर देना नुकसान का सौदा था और अगर वित्तीय तौर पर बात करें तो किंगफिशर एयरलाइन ने कभी पैसा नहीं कमाया। बैंकों को बहुत पहले ही यह समझ जाना था। आज कंपनी का प्रबंधन कह रहा है कि सरकार का कर ढांचा उसके पतन का प्रमुख कारण है, लेकिन यह बात पूरी तरह से सही नहीं है।

एयरलाइंस के लिए कर ढांचे में सुधार करना जरूरी है, लेकिन किंगफिशर के बुनियादी बिजनेस मॉडल में भी गड़बड़ियां थीं। अब कंपनी के सभी स्टेकहोल्डर्स को एकजुट होकर इस स्थिति का सामना करना चाहिए। स्थिति विकट है और किसी न किसी को घाटा उठाना पड़ेगा। बहुत संभव है कि बैंकें ही घाटा उठाएंगी, जिन्होंने ऋण देने से पहले ज्यादा सोच-विचार नहीं किया था। इनमें से कुछ बैंकें सार्वजनिक क्षेत्र की हैं, जिसका यह मतलब है कि कुछ लोगों की गलतियों का खामियाजा करदाताओं को भी भुगतना पड़ेगा।

मैं खुद को किंगफिशर की उस फ्लाइट अटेंडेंट से यह पूछने से रोक नहीं पाया कि क्या उसे अपनी कंपनी की मौजूदा स्थिति के बारे में पता है। उसने कहा कि ज्यादा तो नहीं मालूम, लेकिन उसे अपना वेतन अभी तक नहीं मिला है और कुछ लोग यह कहकर उसे डरा रहे हैं कि उसकी कंपनी का भविष्य अंधकार में है।

मैं उससे पूछता हूं कि उसे क्या लगता है। वह जवाब देती है : ‘मुझे लगता है यह कुछ देर की उथलपुथल है। यदि हम अपने सीट बेल्ट कस लें और कुछ देर प्रतीक्षा करें तो मुश्किल भरा दौर अपने आप गुजर जाएगा।’ किंगफिशर के लिए लगन और मेहनत से काम करने वाले उन सभी कर्मचारियों के लिए, जो इस विपदा के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, मैं यह आशा करता हूं कि उसकी बात सही साबित हो। - लेखक अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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