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कभी तनहाइयों में ‘मुबारक’ याद आएंगी?

 
Source: चंडीदत्त शुक्ल   |   Last Updated 00:29(23/12/11)
 
 
 
 
भास्कर ब्लॉग. . महबूब के लबों ने चूमीं अंगुलियां। पलकें मिचीं, छलके आंसू, थरथराने लगे होंठ.. यही तो है मोहब्बत। फिर एक पल ऐसा भी आया, जिसे चाहा, जुदा हो गया। ऐसे में दूर से किसी बिरहन की तान आकर कानों में समाती है। यह आवाज है मुबारक बेगम की, जिसे सुनकर पिछले साठ साल से आशिकी में गिरफ्तार दिल आंसू बहाते रहे हैं, पर अफसोस, ‘कभी तनहाइयों में यूं हमारी याद आएगी’ जैसे नग्मे को मौसिकी का पैरहन देने वाली मुबारक का पुरसाहाल कोई नहीं।

क्या आप मिलना चाहेंगे मुबारक बेगम से? मुंबई के एक भीड़भाड़ भरे इलाके जोगेश्वरी के ग्रांट रोड में कबूतरखाने जैसे छोटे-से घर में सुरों की ये मलिका जिंदगी के बचे-खुचे दिन काटने को मजबूर है। कभी रेड कारपेट पर कदम रखने वाली मुबारक को कहीं जाना होता है तो अपने कमजोर पांव घसीटती हुई सड़क तक जाती हैं और भीड़ का एक गुमनाम हिस्सा बनकर चुपचाप किसी वाहन के गुजरने का इंतजार करने लगती हैं। उनकी आंखों में बुढ़ापे की धुंध नहीं, शिकायत भरी पुकार है। मुबारक ज्यादा नहीं बोलतीं, लेकिन उनकी रग-रग चीख-चीखकर कहती है : ‘आप मानें या न मानें, मेरे कातिल आप हैं!’

एक-एक गीत की शूटिंग, कंपोजिशन और रिकॉर्डिग पर लाखों खर्च करने वाली फिल्म इंडस्ट्री ने बेगम को भुला दिया है। ‘मुझको अपने गले लगा लो ऐ मेरे हमराही..’ और ‘कुछ अजनबी से आप हैं..’ जैसे गीत जीवंत करने वाली मुबारक बेगम को महाराष्ट्र सरकार की ओर से डेढ़ हजार की पेंशन मिलती है। कई बार बिजली का बिल भरने के पैसे तक पास नहीं होते। सरकार ने लाख रुपए की सहायता राशि देने की बात कही थी, लेकिन दो महीने बाद भी इस घोषणा पर अमल नहीं हुआ।

मुबारक ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं। उनकी दोस्ती अक्षरों से नहीं हो सकी, पर इल्म से नाता ऐसा जुड़ा कि दरकती सांसों के बीच भी बरकरार है। दादा अहमदाबाद में चाय की दुकान करते थे। अब्बा फलों की ठेली लगाते थे, लेकिन उस्ताद थिरकवा खान साहब के शागिर्द भी बन गए थे। कुछ दिन बाद वे मुंबई आ गईं। किराना घराने के उस्ताद रियाजुद्दीन खान और उस्ताद समद खान साहब ने उन्हें विधिवत शिक्षा दी।

फिल्म ‘आइए’ के लिए मुबारक ने पहला गीत ‘मोहे आने लगी अंगड़ाई..’ रिकॉर्ड कराया और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। मुबारक ने ‘मेरा भोला बलम’ (कुंदन), ‘देवता तुम मेरा सहारा’ (दायरा), ‘जल-जल के मरूं’ (शीशा), ‘हम हाले दिल सुनाएंगे’ (मधुमती), क्या खबर थी यूं तमन्ना’ (रिश्ता) जैसे कई गीत गाए, जिनकी तान के साथ हिंदुस्तानी मन उफान भरता रहा है, तड़पता-सिसकता, लरजता और खुशगवार होता रहा है।

कहते हैं, बॉलीवुड की एक गायिका मुबारक की लोकप्रियता से इस कदर खौफजदा हुईं कि उन्होंने संगीतकारों को ताकीद की कि मुबारक को अब और मौके नहीं मिलने चाहिए। ऐसा ही हुआ भी। हमराही, जुआरी, ये दिल किसको दूं, सुशीला, मोरे मन मितवा, मार्वल मैन, शगुन, खूनी खजाना, सरस्वतीचंद्र सरीखी कामयाब फिल्मों में गायन करने के बावज़ूद मुबारक को नए अनुबंध मिलने बंद हो गए। गुमनामी के भंवर में घिरी मुबारक जब-जब बीता वक्त याद करती हैं, उनकी आंखों से आंसुओं की बारिश होने लगती है। विविध भारती में कार्यरत यूनुस खान कहते हैं ‘यह दुर्भाग्य ही है कि ऐसे नगीने को अंधेरों में ही घुटना पड़ रहा है।’

पर्किसन जैसी बीमारी झेल रहीं मुबारक बेटी और पोतियों के साथ एक छोटे-से सीलनभरे कमरे में रहती हैं। बेटा टैक्सी चलाता है। रोज बच्चों को स्कूल छोड़ने ले जाता है। काश! हमारे नुमाइंदे भी कभी उस टैक्सी में लिफ्ट लेते, किसी स्कूल तक जाते तो इल्म की थोड़ी-सी रोशनी उनकी भी निगाह में भर जाती और वे मुबारक का हाल ले पाते।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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