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नई उम्मीदें जगाता नया लोकपाल

वेदप्रताप वैदिक | Nov 28, 2012, 01:46AM IST
 
 

राज्यसभा  की प्रवर समिति ने लोकपाल विधेयक का जो मसविदा पेश किया है, वह कुछ जन-लोकपालवादियों को चाहे संतुष्ट न कर पाए, लेकिन संभवत: सभी सांसदों और देश की आम जनता को स्वीकार होगा। यह विधेयक लोकसभा में पारित होने के बाद राज्यसभा में अटक गया था। उस समय सबको काफी बुरा लगा था, लेकिन अब पता चल रहा है कि कभी-कभी बुरा होना भी कितना अच्छा होता है। राज्यसभा भी इसे जस का तस पारित कर देती, तो यह सरकारी लोकपाल सिर्फ धोकपाल बनकर रह जाता। इसे लोकसभा ने हड़बड़ी में पास कर दिया, क्योंकि संसद दबाव में आ गई थी। जनता के दबाव में आ जाना स्वस्थ लोकतंत्र का प्रमाण है, लेकिन दबाव के कारण स्वाभाविक और आवश्यक प्रक्रिया का उल्लंघन कितना घातक हो सकता है, इसका प्रमाण लोकसभा की त्वरित कार्यवाही है।
 
राज्यसभा की प्रवर समिति द्वारा प्रस्तावित विधेयक की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह प्रधानमंत्री को कानून के ऊपर नहीं मानता। लोकपाल का अंकुश अब प्रधानमंत्री पर भी रहेगा। यदि प्रधानमंत्री लोकपाल की पकड़ से बाहर रहता है तो वह सारे राजनीतिक अपराधियों का शरणदाता और त्राता भी बना रहता है। हर घोर अपराधी यह मानकर चलता है कि मैं कुछ भी करूं, मेरी पार्टी का नेता मुझे बचा लेगा। सैयां भए कोतवाल तो डर काहे का!  अब सैयां पर भी चाबुक चलेगा। जब सारे शासन के सिरमौर की भी खाल खींची जा सकती है तो अब कौन बचेगा? अब भ्रष्ट मंत्रियों और बड़े से बड़े अफसरों की हड्डियों में भी कंपकंपी दौड़ जाएगी। 
 
यह ठीक है कि प्रधानमंत्री को आंतरिक व बाह्य सुरक्षा, परमाणु ऊर्जा, विदेश नीति और लोक-व्यवस्था के मामलों में कोई भी लोकपाल घेर नहीं सकता। ये ऐसे मामले हैं, जिन पर सूचना का अधिकार भी लागू नहीं होता और इन मुद्दों से जुड़े कई पहलू इतने गोपनीय होते हैं कि उन पर संसद में भी जवाबदेही नहीं होती। इसका अर्थ यह नहीं कि इन महत्वपूर्ण मामलों में प्रधानमंत्री या उसका कार्यालय किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचार नहीं कर सकता। कर तो सकता है, लेकिन उन मामलों को लोकपाल से भी अधिक मजबूत मंच पर उठाया जा सकेगा। जैसे संसद, खबरपालिका और जन-प्रदर्शन इत्यादि। अर्थात प्रवर समिति का यह विधेयक प्रधानमंत्री को कुछ उन्मुक्तियां तो देता है, लेकिन वे निरंकुश नहीं हैं। बस, लोकपाल का अंकुश कुछ मामलों में एकमात्र अंकुश नहीं होगा। 
 
प्रधानमंत्री को लोकपाल के घेरे में लाया जाए या नहीं, इस पर हमारे राजनीतिक दलों और नेताओं की राय बंटी हुई थी। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद को कसौटी पर चढ़ाने के लिए तैयार थे, लेकिन कांग्रेस पार्टी तैयार न थी। यही हाल उन विरोधी पार्टियों का भी था, जो अब सत्ता के सपने देख रही हैं, लेकिन प्रवर समिति के अध्यक्ष सत्यव्रत चतुर्वेदी को दाद देनी होगी कि उनकी समिति ने प्रधानमंत्री को लोकपाल के घेरे में लाकर एक तीर से दो शिकार कर लिए। एक तो संपूर्ण शासन-व्यवस्था की कमर कस दी। दूसरा, जन-लोकपाल आंदोलन की हवा निकाल दी। 
 
अब जन-लोकपाल का आंदोलन कैसे चलेगा? जब डंडा ही हट गया तो झंडा कैसे फहरेगा? देश में करोड़ों लोग राष्ट्रमंडल खेलों और 2जी स्पेक्ट्रम के भ्रष्टाचार से बिलबिलाए हुए थे। उसी मौके पर लोकपाल की बात उठी और उसने तूल पकड़ लिया। अब यह काठ की हांडी क्या दूजी बार चूल्हे पर चढ़ पाएगी? दूसरे अर्थो में राज्यसभा की प्रवर समिति द्वारा प्रस्तावित यह विधेयक लड़खड़ाती कांग्रेस के हाथ की एक लाठी बन जाएगा। यह कांग्रेसियों और उनके विरोधियों के लिए भी एक राहत सिद्ध होगा। 
 
सीबीआई के मुद्दे पर भी इस प्रवर समिति का रवैया थोड़ा बेहतर है। सीबीआई को पूर्ण स्वायत्त करने की बात कोई भी प्रमुख दल नहीं मानता। इसका मुख्य कारण यह तो है ही कि सभी दल सत्तारूढ़ होने का सपना देखते हैं और सत्तारूढ़ होकर कौन दल ऐसा है, जिसके नेता व कार्यकर्ता अपराध नहीं करते? सीबीआई स्वायत्त हो जाए तो क्या अपनी ही जूती अपने ही सिर नहीं बजेगी? इस भय के अलावा एक तथ्य यह भी है कि सीबीआई पूर्ण स्वायत्त हो जाए तो वह कहीं सरकार से भी अधिक मजबूत नहीं हो जाएगी? यदि सीबीआई पूर्ण स्वायत्त हो जाए तो सेना क्यों नहीं? पुलिस क्यों नहीं? क्या इन संस्थाओं का चरित्र, आचरण और गठन ऐसा है कि इन्हें अपने भरोसे छोड़ा जा सकता है? जिस संसद और न्यायपालिका को हम पूर्ण स्वायत्त मानते हैं, उन पर भी सरकार के अनेक स्थूल और सूक्ष्म नियंत्रण हैं। अत: प्रस्तुत विधेयक में सीबीआई के निदेशक के चयन का अधिकार प्रधानमंत्री, विपक्षी-नेता और मुख्य न्यायाधीश को देकर काफी संतोषजनक नियुक्ति का आधार तैयार किया गया है।
 
लोकपाल द्वारा उठाए गए मामलों की जांच के लिए पृथक व्यवस्था, सीबीआई निदेशक का सीमित और सुनिश्चित कार्यकाल तथा गैर-सरकारी वकीलों की नियुक्ति आदि प्रशंसनीय प्रावधान हैं। लोकपाल को हटाने के बारे में भी प्रक्रिया ठीक ही मालूम पड़ती है, लेकिन उस पर तथा अन्य प्रावधानों पर भी संसद के दोनों सदन ठंडे दिमाग से विचार कर सकते हैं। असल मुद्दा यह है कि आम जनता को त्रस्त करनेवाले भ्रष्टाचार के रोजमर्रा के मामलों को कौन देखेगा? निचली नौकरशाही को भी लोकपाल के नीचे क्यों नहीं लाया गया है? कहीं यह लोकपाल भी सिर्फ हाथी के दांत की तरह दिखाने की वस्तु बनकर न रह जाए, यह देखना हमारे जागरूक सांसदों का काम है। यदि तर्कसंगत संशोधन लाए जाएं तो कौन उनका स्वागत नहीं करेगा? अब आंदोलनकारियों का ध्यान सड़क की बजाय संसद पर केंद्रित होना चाहिए। 
 
प्रवर समिति के प्रारूप से अब विभिन्न राज्य भी संतुष्ट होंगे, क्योंकि अब राज्यों के लोकायुक्त केंद्रीय लोकपाल के मातहत नहीं होंगे। जहां तक दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों को लोकपाल में 50 फीसदी प्रतिनिधित्व देने की बात है, तो वह 70 फीसदी भी हो जाए तो बुरा नहीं है, लेकिन अगर वह ‘आरक्षण’ का रूप लेता है तो प्रकारांतर से भ्रष्टाचार ही है।
 
 
 

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