रेल किराये का सवाल
नए रेल मंत्री पवन कुमार बंसल ने रेल यात्रा को महंगा करने का संकेत दिया है। हालांकि उनका कहना है कि सिर्फ बढ़ाने के मकसद से रेल किराया नहीं बढ़ेगा, बल्कि इसका उद्देश्य रेलवे सुविधाओं में सुधार करना होगा। अगर इस बात पर उनकी पूरी भावना के मुताबिक अमल हो सके, तो यह संभव है कि यात्री खुद पर पड़े बोझ की ज्यादा शिकायत न करें।
पिछले रेल बजट में जब तत्कालीन रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने रेल किराया बढ़ाने का प्रस्ताव किया, तो आमतौर पर उनकी मजबूरी को आम लोगों ने समझा था। रेल कर्मचारी तो खुलकर उसके समर्थन में सामने आए थे। लेकिन त्रिवेदी को उस लीक से हटने की कीमत चुकानी पड़ी, जिस पर पिछले डेढ़ दशक से रेल मंत्री चलते आए थे।
इस दौर में रेलवे को सियासी लाभ का वाहन बना दिया गया। बिना बुनियादी ढांचे को फैलाए नई ट्रेनें चलाने और यात्रा को सस्ता रखने की कोशिश में सुरक्षा एवं सुविधाओं की लगातार अनदेखी ने रेलवे को उस हाल में पहुंचा दिया, जहां आज वह एक मरता हुआ संगठन दिखती है। इसकी मिसाल किसी आम ट्रेन और स्टेशन पर बदहाली के रूप में देखी जा सकती है।
रेलवे के आधुनिकीकरण पर सुझाव देने के लिए बनाई गई सैम पित्रोदा समिति ने अगले पांच साल में इसमें 5 लाख 60 हजार करोड़ रुपए के निवेश की सिफारिश की है। अगर इतने संसाधन जुटाने हों, तो उसका कुछ बोझ आम यात्रियों को भी उठाना होगा। इसलिए कृत्रिम रूप से रेल यात्रा को सस्ता रखना दूरगामी नजरिये से संभवत: उचित विकल्प नहीं है। लेकिन यह अवश्य है कि किराया या माल भाड़ा बढ़ाने के तर्क पारदर्शी हों और उसका लाभ यात्रियों को जल्द ही दिखे।
बंसल के पहले यह मंत्रालय संभाल रहे सीपी जोशी ने किराये को तर्कसंगत बनाने और उसे ईंधन की लागत से जोडऩे के लिए रेल शुल्क प्राधिकरण के गठन का एलान किया था। अगर इसमें यात्री या उपभोक्ता हितों की वकालत करने वाले समूहों को भी नुमाइंदगी दी जाए, तो उससे किराया और सुविधाओं के बीच संबंधों के लगातार मूल्यांकन की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। बहरहाल, रेलवे के पुनरुद्धार को अब और नहीं टाला जाना चाहिए।






