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मन को नयापन भीतर ही मिल जाए तो वह बाहर नहीं कूदेगा

 
Source: पं. विजयशंकर मेहता   |   Last Updated 01:09(08/02/12)
 
 
 
 
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जीने की राह..मन  को जो-जो चीजें पसंद हैं, उनमें से एक है बेईमानी करना। उसे नई-नई किस्म की बेईमानियां ढूंढ़ने में बड़ा मजा आता है। मनुष्य के भीतर गलत के प्रति जो प्रोत्साहन होता है, वह मन द्वारा ही फेंका गया होता है। मन की आकांक्षाएं मनुष्य की महत्वाकांक्षाएं बन जाती हैं और अति महत्वाकांक्षी व्यक्ति अनुचित का चुनाव करने में संकोच नहीं करता। मन को नवीनता में भी रुचि है।


 


 जैसे कुछ लोगों का स्वभाव होता है कि वे वस्तु की उपयोगिता से ज्यादा उसके नए होने में रुचि रखते हैं। फिजूलखर्ची इसी का नाम है। हम उदाहरण ले सकते हैं आज के जीवन में मोबाइल रखना और लगातार बदलना उपयोगिता से ज्यादा लेटेस्ट का मामला है। मन इसी शैली में रिश्तों पर, सिद्धांतों पर काम करता है। जो लोग मन की रुचि से चलते हैं, वे संसार पर टिक जाते हैं। संसार की दौड़ तेजी से परिवर्तन का मामला है।


 


 इसीलिए मन की रुचि सांसारिक कार्यो में ज्यादा होती है। अब जैसे ही हम भीतर उतरते हैं, मन को अध्यात्म से जोड़ने का क्रम आरंभ हो जाता है। अब मन छटपटाता है। इसलिए समझदार भक्त लोग मन की नवीनप्रियता को जानकर उसे भीतर ही नई-नई वस्तुएं उपलब्ध कराते हैं। भीतर जाकर जैसे ही आप अपने पुराने को काटने लगते हैं, बस वहीं से चेतना जाग्रत होती है। नई-नई कथाएं सुनना, लगातार ध्यान करते रहना हमारे भीतर हमारे अतीत के बोझ से हमको मुक्त कराता है। अब मन को नया चाहिए। यदि वो उसे भीतर ही मिल जाए तो फिर वह बाहर नहीं कूदेगा। ईश्वर के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि वो नित-नया होता जाता है। इसी का नाम जिंदगी की ताजगी है।      
                                    


 


humarehanuman@gmail.com

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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