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बर्बाद वक्त का लेखा-जोखा

खुशवंत सिंह | Jul 28, 2012, 00:17AM IST
 
 

मैं अखबार में न्यूज हेडलाइंस पर निगाह दौड़ाने के बाद वर्ग-पहेलियों को हल करने में जुट जाता हूं। आज सोचता हूं कि मैंने अपनी जिंदगी का कितना कीमती वक्त इनके चक्कर में बर्बाद कर दिया।

मैं 98 साल का हो चुका हूं। इस उम्र में अक्सर लोग बैठे-ठाले अपनी पिछली जिंदगी को याद करते रहते हैं और मैं भी इसका अपवाद नहीं हूं। मैं अक्सर सोचता हूं कि आखिर मैंने वर्ग-पहेलियां सुलझाने में अपने जीवन का कितना कीमती वक्त जाया कर दिया। मेरे घर में रोज पांच अखबार आते हैं और इन सबमें वर्ग-पहेलियों के कॉलम भी होते हैं। मुझे वर्ग-पहेलियों का जबरदस्त चस्का लगा है और मैं न्यूज हेडलाइंस पर सरसरी निगाह दौड़ाने के बाद इन वर्ग-पहेलियों को हल करने में जुट जाता हूं।

इन वर्ग-पहेलियों को भरते-भरते सुबह से दोपहर हो जाती है और तब मैं अपने मध्याह्न् भोजन के लिए उठ जाता हूं। कई बार तो मैं दुपहरी में थोड़ी-देर आराम फरमाने के बाद पुन: इन वर्ग-पहेलियों में उलझ जाता हूं। इनके अलावा मुझे कुछ सूझता ही नहीं। अब जाकर मुझे लगता है कि मैंने अपनी जिंदगी के कई साल समय गुजारने के एक ऐसे शगल के चक्कर में बर्बाद कर दिए, जिससे मुझे कोई फायदा नहीं हुआ। मैं तो एक मूढ़मति बुजुर्ग हूं, जो जिंदगी के असल मकसद को नहीं समझता। अब तो मैं सिर्फ इतना ही कर सकता हूं कि अपने पाठकों को चेताऊं कि वे मेरे रास्ते पर न चलें। आखिर जिंदगी को यूं ही समय गुजारने की निर्थक कवायद में बर्बाद नहीं किया जा सकता।

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आदिल जस्सावाला :
मैं तीन महीने की अल्पावधि के लिए शांति-निकेतन में रहा। वहां पर एक पारसी लड़की से मेरी मुलाकात हुई, जिसका नाम था- मेहेर। जल्द ही हमारी अच्छी पटने लगी। उससे मेरी दोस्ती का प्रमुख कारण यह था कि हम दोनों ही बांग्ला नहीं बोल पाते थे। कुछ दिनों बाद मैं लाहौर में अपने कॉलेज वापस आ गया, लेकिन पत्रों के जरिए हमारा संपर्क बना रहा। कुछ समय बाद मेहेर की शादी हो गई और वह मेहेर जस्सावाला बन गईं। इसके साथ ही हमारे पत्र-व्यवहार का सिलसिला भी खत्म हो गया। मैं तकरीबन नौ वर्षो तक ‘द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया’ का संपादक रहा। इस दौरान मैंने मेहेर के सुपुत्र आदिल जस्सावाला की अनेक कविताएं अखबार में प्रकाशित कीं।


आदिल बॉम्बे (अब मुंबई)के कैथ्रेडल स्कूल में पढ़ाई करने के बाद लंदन चले गए और ऑक्सफोर्ड के यूनिवर्सिटी कॉलेज में दाखिला ले लिया। इसके बाद वह लंदन में स्थित इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी पढ़ाने लगे। वर्ष १९७क् में वह वापस बॉम्बे लौट आए। यहां आकर उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कर दीं। अब तक उनके आठ संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। मैंने अपने द्वारा संपादित जर्नल में उनकी अनेक कविताओं को प्रकाशित किया है। कुछ समय पूर्व उनकी नई किताब बाजार में आई- ‘ट्राइंग टू से गुडबॉय’, जिसे आलमोस्ट आइलैंड बुक्स ने प्रकाशित किया है। बहरहाल, उनकी एक कविता यहां पेश है :-
मैं यह सोचते हुए ऊपर बढ़ा,
कि मैं नहीं हूं दूसरों के जैसा।
लेकिन देख सकते हैं आप,
कि मैं हूं बिल्कुल ही वैसा।
तमाम घरौंदों की है एक जैसी दशा।
हमें खड़ा करने के लिए,
तुम बनाते हो जो योजनाएं।
वे सबसे पहले छूती हैं,
हमारी नींव को।
अजनबी लोग,
अभी भी तलाश रहे हैं आशियाना।
मैं भी रहा हूं महीनों तक,
उनकी निगाहों का निशाना।
बहरहाल,
मैं तुम्हें छोड़ रहा हूं आजाद।
मेरा चाहे जो भी हो,
तुम्हारा भविष्य क्यों हो बर्बाद।
तुम्हारा ब्रह्मांड बनाया गया,
एक पिन पर थिरकने।
और मेरा रचा गया,
हर हाल में स्थिर रहने।
कहो अपने गुरु से यह जाकर।
स्थिरता बसती है देखो,
घरौंदे में आकर।


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फाइनेंशियल मैनेजमेंट :
संता को सड़क पर टहलते हुए १क्क् रुपए का एक नोट मिला। उसने तुरंत उसे जेब के हवाले किया और सोचने लगा कि इसका भरपूर इस्तेमाल किया जाए। यह सोचकर वह एक फाइव स्टार होटल में पहुंचा और तमाम लजीज व्यंजनों समेत ड्रिंक्स का भी भरपूर लुत्फ उठाया। आखिरकार वेटर बिल लेकर आया, जो तकरीबन साढ़े चार हजार रुपए का था।

लेकिन संता ने बिल को देखा तक नहीं और जेब से १क्क् रुपए का नोट निकालकर वेटर के हाथ में थमाते हुए बोला, ‘जा काका, ऐश कर।’ थोड़ी देर बार वेटर चार मुस्टंडे मार्शलों के साथ वापस लौटा और १क्क् रुपए का नोट संता के मुंह पर दे मारा। तब तक संता पूरी तरह ‘टल्ली’ हो चुका था और उससे खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। आखिरकार मैनेजर ने पुलिस बुलाकर उसे गिरफ्तार करवा दिया। थाने पहुंचकर संता ने वही १क्क् रुपए का नोट पुलिस को दिया और एक घंटे के भीतर उसे उसके घर पहुंचा दिया गया। बाद में संता बंता के समक्ष डींग हांकते हुए बोला - ‘वेख्या साड्डा फाइनेंशियल मैनेजमेंट!’

(सौजन्य : मदन गुप्ता, चंडीगढ़)
 
 
 

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