निर्गुटता के मंच पर
गुट-निरपेक्ष आंदोलन के 16वें शिखर सम्मेलन के जरिए मेजबान ईरान को दुनिया के सामने अपना पक्ष बेहतर ढंग से रखने का मौका मिला।
120 देशों के राष्ट्र या शासन प्रमुखों के सामने दुनिया की मौजूदा परमाणु व्यवस्था पर कुछ देशों के वर्चस्व और उसमें निहित विषमता के खिलाफ आवाज उठाकर उसने इस अवसर का बेहतरीन इस्तेमाल किया।
ऐसा ही उपयोग विभिन्न देशों के नेताओं ने तेहरान आए प्रतिनिधियों से मुलाकात और उसके जरिए दोतरफा या बहुपक्षीय संबंधों में अपने मकसदों को पाने के लिए किया।
मसलन, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद और वहां के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह खामेनई से वार्ताओं के जरिए आपसी रिश्तों की कुछ पेचीदगियां दूर करने की कोशिश की, वहीं उन्हें पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी से एक और मुलाकात का मौका भी मिला, जिसमें भारत-पाक के नेताओं ने आपसी संबंधों में जारी सुधार प्रक्रिया का जायजा लिया।
साथ ही तमाम नेताओं को निगरुट आंदोलन के मंच से विश्व मामलों में अपने-अपने देशों के रुख को जताने का एक अवसर प्राप्त हुआ। लेकिन उस विचार-विमर्श से दुनिया के घटनाक्रम को प्रभावित किया जा सकेगा, यह संदिग्ध है।
कारण यह है कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से निगरुट आंदोलन अपनी नई प्रासंगिकता की तलाश कर रहा है। जिस समय यह आंदोलन उपनिवेशवाद से आजाद हुए देशों की साझा आवाज था और इसके सदस्य देशों के बीच समन्वित रुख की उम्मीद रखी जाती थी, उस समय निगरुट शिखर सम्मेलनों के प्रस्तावों पर न सिर्फ दुनिया गौर करती थी, बल्कि महत्वपूर्ण मसलों पर विमर्श को प्रभावित करने में भी यह आवाज एक हद तक कामयाब रहती थी।
वह संदर्भ खो चुका है। शीत युद्ध के बाद की दुनिया में आसियान, ब्रिक्स, शंघाई सहयोग परिषद, जी-20 जैसे आर्थिक ताकत एवं साझा रणनीतिक समझ के आधार पर बने समूह चीजों को अधिक प्रभावित कर रहे हैं। चूंकि निगरुट आंदोलन अपना ऐसा कोई संदर्भ बनाने में नाकाम है, इसलिए यह महज बातचीत का ही मंच रह गया है।






