नौ जिंदगियों वाले मीडिया के लिए क्या है नुस्खा
एम. जे. अकबर | May 13, 2012, 00:38AM IST

आह! मीडिया तो महज नुक्कड़ की एक बिल्ली है। यह अपने जीवन के अधिकांश हिस्से में ज्यादा कुछ नहीं करती- अपने ही चेहरे को चाटते रहने या अपनी प्रतिभा और शान पर संतोष से घुरघुराने के सिवाय। आत्ममुग्धता और पत्रकार पत्र-मित्र होते हैं। पर उन्हें एक विशेष लाभ भी है।
आत्ममुग्ध तो अपनी ही छवि को निहारता रहता है, लेकिन उसके उलट, यह बिल्ली अपनी आंखें खोले रखती है और जिस हद तक देख सकती है, घर की निजता में होने वाले हर गुलगपाड़े को रिकॉर्ड करती है। इस बिल्ली पर आप भले ही कभी-कभार गौर करें, लेकिन यह आप पर हर पल निगाह रखती है।
यह बहुत नैतिकतापूर्ण तो नहीं है, लेकिन फिर भी यह है तो बिल्ली ही। यह न तो सजी-संवरी फारसी बिल्ली है, न ही गुर्राने वाली आवारा बिल्ली, हालांकि यह दोनों बन सकती है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि यह कौन-सा अवतार लेती है। कभी यह पूरी तरह से फारसी बन जाती है और जब इसे प्रतिष्ठान द्वारा सहलाया जाता है या उपहारों के जरिए भ्रष्ट किया जाता है, तो यह रेशमी फर में सजी-संवरी रहती है।
अन्य मौकों पर यह इशारे देने वाली आवारा होती है और तुरत-फुरत कर्कश स्वर में गुर्राने लगती है या लड़ाई में कूद पड़ती है, खासतौर पर तब, जब इसे अपने अस्तित्व पर संकट का अंदेशा होता है- प्रिंट मीडिया के मामले में इसे प्रसार संख्या के नाम से जाना जाता है और टेलीविजन के लिए टीआरपी कहा जाता है। एक जमाने में यह बिल्ली समाचार पत्र हुआ करती थी, जो आधी रात को बिस्तर पर जाती थी।
अब इसने एंटिना विकसित कर लिए हैं और ओबी वैन हासिल कर ली हैं। अब यह क्रमवार चेतना के साथ लंबे समय तक जागे रहती है। वास्तव में, यह कोई बहुत बड़ी बिल्ली नहीं है, हालांकि यह शिकार की टोह में राजनीतिक जंगल में घूमती रहती है। परंतु बुरे दिन में भी यह चूहा तो पकड़ ही लेती है।
और इसकी नौ जिंदगियां होती हैं। इसे मारने या ऐसी कोशिश करने वाले राजनीतिज्ञ इस बात को भूल जाते हैं। चूंकि कुछ जगहों पर अपनी ख्याति के विपरीत, राजनेता व्यावहारिक लोग होते हैं, इसलिए इस मतिभ्रष्ट व्यवहार के लिए कुछ तर्कसंगत सफाई होनी ही चाहिए। तो फिर क्यों सत्ता में बैठे राजनेता मीडिया के उत्पीड़न या कुछ मूर्खतापूर्ण तरीकों से सेंसर लगाने के प्रलोभन में पड़ जाते हैं कि यह तत्काल हर किसी को नजर आने लगता है? शायद उनके निर्णय का मंत्रालय से सीधा नाता होता है। लोकतंत्र का हर विजेता अब जानता है कि पराजय सिर्फ वक्त की बात है। स्थायी पुनर्निर्वाचन का दौर पिछली सदी तक ही था।
परंतु जब तक निराशाजनक क्षितिज दूर का अंदेशा लगता रहता है, सत्तासंपन्न लोग अगर आत्मसंतुष्ट और मस्त नहीं, तो शांत तो बने ही रहते हैं। लेकिन जब अंदेशा होनी में बदल जाता है, तो फिर अच्छा निर्णय काफूर होने लगता है। मनोदशा भुरभुराने लगती है।
शानो-शौकत और मंत्रालय की सुख-सुविधा-सम्मान से परे जीवन के आसार मंत्रियों को विक्षुब्ध कर देते हैं और मुख्यमंत्रियों (साथ ही उनके संरक्षकों) को सनक में ठेल देते हैं। आंध्रप्रदेश में इस उम्मीद के साथ साक्षी समूह के खातों को फ्रीज करने के ओछे निर्णय कि इससे इसकी पिंट्र और दृश्य-श्रव्य परिसंपत्तियां भरभरा जाएंगी, का भला और क्या स्पष्टीकरण हो सकता है?
यह स्पष्ट है कि हैदराबाद में कांग्रेस सरकार गंभीर बीमारी से जूझ रही है। पार्टी एक सरौते के द्वारा चीरी-फाड़ी जा रही है : तेलंगाना उसका एक हत्था है और जगन रेड्डी की बढ़ती लोकप्रियता दूसरा। कांग्रेस यह जानने की अनिच्छुक है कि ये दोनों हत्थे उसके खुद के बनाए हुए हैं।
आंध्र की राजनीति में तेलंगाना की मांग का उतार-चढ़ाव 1960 के दशक से शुरू हुआ। इसे आर्थिक विकास की अंत:प्रेरणा से चिंगारी मिली और अन्याय के एहसास से यह सान चढ़ी। विडंबना है कि जब कांग्रेस को वाई. राजशेखर रेड्डी नामक मुख्यमंत्री मिले, तो उसने इस भावनात्मक मांग पर काबू पाया। रेड्डी ने आर्थिक वेग को गांवों की ओर मोड़ा और आम संकेत दिया कि बेहतर भविष्य पहुंच के भीतर है। 2009 के विधानसभा और आम चुनाव नतीजे इसकी गवाही दे रहे थे। बहरहाल, उनकी आकस्मिक, असामयिक मृत्यु ने पार्टी को पूरी तरह सदमे में डाल दिया।
स्थानीय कार्यकर्ताओं और हाईकमानों, दोनों ने कथानक ही खो दिया। खराब समय में गृहमंत्री पी. चिदंबरम की गलत बयानी ने लगभग प्रसुप्त हो चुके तेलंगाना आंदोलन को पुन: सक्रिय कर दिया। आज तो आत्मसमर्पण किए बगैर इस पर लगाम लगाने की उम्मीद कम ही है। इससे भी बुरी बात, कांग्रेस ने एक तरह से रेड्डी के बेटे जगन को उनके ओहदे से हांक दिया और उन्हें अधीनता के लिए धमकाने की खातिर राज्य के सारे पीड़क उपकरणों का इस्तेमाल शुरू कर दिया।
जगन रेड्डी ‘साक्षी’ के मालिक हैं। यह दीर्घकालीन और तात्कालिक कारणों से हमले की जद में है : कांग्रेस सरकार की सलामती के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण उपचुनाव होने हैं। इसी समय कांग्रेस के शुभचिंतकों ने उसे बताया कि दो कारणों से आभासी सेंसरशिप कारगर नहीं रहती। मीडिया, सरकार की कल्पना से भी ज्यादा लचीला होता है।
साथ ही ऐसा करना प्रतिकूल परिणाम भी देता है। लोकप्रिय आकलन में, यह बुरी खबर के असर को बढ़ाता ही है। यदि आपके पास छुपाने को कुछ है, तो फिर यह बहुत भद्दा और भयंकर ही होगा। कोई बू यदि अतिदरुगध में बदल जाती है, तो इसकी ठीक-ठीक वजह यह है कि आपको इसका स्तर भांपने की अनुमति ही नहीं दी गई।
मीडिया के लिए सबसे अच्छा नुस्खा है कि उसे अकेला छोड़ दिया जाए। कुछ नेता मौके-बेमौके इसे खुराक देने से रुक ही नहीं सकते। और यदि यह खुराक बस सूचना ही हो, तो कोई नुकसान नहीं है और शायद कुछ अच्छा ही हो। सरकार की नियति मीडिया के द्वारा तय नहीं होती। जब सरकारें मरती हैं, तो हमेशा यह आत्मघात का ही मामला होता है, हत्या का कभी नहीं। -लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।





