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ज्ञान का गोदाम नहीं, समझ का उपकरण हैं शास्त्र

 
Source: पं. विजयशंकर मेहता   |   Last Updated 00:24(06/02/12)
 
 
 
 
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जीने की राह..जीवन में अनेक बार प्रश्नों का समाधान ऐसे स्थानों से मिलता है, जहां की हम उम्मीद भी नहीं करते। इसीलिए जो लोग साधना के पथ पर रहते हैं, वे लगातार अपनी जिज्ञासा मिटाने के लिए शास्त्रों का सहारा लेते हैं। ये सही है कि कुछ शास्त्र समाधान कर देते हैं तो कुछ उलझा भी देते हैं। बहुत अधिक अध्ययन से ज्ञान प्राप्त हो जाए, यह जरूरी नहीं होता।


खासतौर पर धार्मिक शास्त्रों में दिए गए पात्रों के आचरण में संदेह होना स्वाभाविक है। उनके जीवन में जो चुनौतियां आती हैं, शास्त्रों के लेखक उस पर केंद्रित होकर संदेश देते हैं। शास्त्रों की कथाओं की सामग्री इसी तरह चुनी जाती है कि जीवन के प्रश्नों के उत्तर ठीक से मिल जाएं।


इसीलिए पढ़ते समय जो अनावश्यक हो, उसे अस्वीकार करने का विवेक धार्मिक पाठक को रखना होगा, क्योंकि जरूरी नहीं कि लेखक के भाव से जुड़कर पढ़ने वाले को समाधान मिल जाए। इसलिए पंक्तियों को परीक्षण के माध्यम से पढ़ना चाहिए। कई पंक्तियां परिपक्व व विकसित मन से लिखी गई होती हैं, इसलिए पढ़ते समय संतुलित और आशावादी दृष्टिकोण रखना होगा।

ऋषि-मुनियों ने अच्छाई और बुराई के संघर्ष को बताने के लिए अपने साहित्य का जो खलनायक रचा, कई बार वह एक नैतिक चुनौती भक्तों के सामने खड़ी कर देता है। पाठक को दुविधा होने लगती है कि जिसे परमात्मा कहा है, वो सही हैं या नहीं या ईश्वर मनमानी पर उतर आया है। चूंकि मनुष्य का मन प्रतिस्पर्धी होता है, इसलिए अवतारों की लीलाओं पर भी प्रश्नचिह्न् खड़ा करता है। अत: शास्त्रों को ज्ञान का गोदाम न मानकर समझ का उपकरण भी स्वीकार करना पड़ेगा।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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